25 April, 2010

मायावती ही शिकार क्यों?

डॉ.गोपा जोशी के ब्लॉग वर्तमान भारतीय राजनीति से साभार
http://gopajoshi2010.blogspot.com/

15-16 मार्च 2010 को उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री मायावती ने अपने विरोधियों तथा मनुवादी समाज को दिल भर के चिढ़ाया। 15 मार्च को माया को (बकौल कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के प्रभारी दिग्विजय सिंह के) दस मीटर लंबी हजार रुपए के नोटों की माला पहनाई गई थी। एक रपट के अनुसार इस माला में 50000 नोट लगे थे। सारे टी वी चैनल हतप्रभ थे। एक ऐंकर ने तो स्वामी रामदेव से वादा भी ले लिया कि राजनीति में आने के बाद स्वामी जी नोटों की माला नहीं पहनेंगे। (क्या वादा निभाने कभी कोई राजनीति में आता है?) राजनीतिज्ञों तथा मीडिया की हायतौबा को धत्ता बताते हुए मायावती ने 16 मार्च को फिर 18 लाख रुपये की नोटों की माला पहन ली। साथ ही अपने समर्थकों से घोषणा भी करवा दी कि भविष्य में मायावती का स्वागत उनके दल के लोग नोटों की माला पहना कर ही करेंगे।

15-16 की शाम प्राइम टाइम में करीब करीब सभी चैनलों ने माला प्रकरण में बहस मुबाहिसे करवाए। इन बहसों में भाग लेने वाले अधिकतर विशेषज्ञ भी नोटों की माला प्रकरण से क्षुब्ध थे। केवल दलित विशेषज्ञों को ही इसमें कुछ भी अनुचित नहीं लग रहा था। इससे पहले रैली के लिए नगर की साज सज्जा, प्रकाश तथा रैली भाग लेने वालों के खाने पीने के विस्तृत इंतजाम पर भी अंगुली उठ रही थी। कारण यह सब सरकारी पैसे से हो रहा था। क्या लालू के महा रैला निजी धन खर्च कर होते थे? या अन्य सत्ताशीन दल अपने पैसे से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। इंदौर में बीजेपी का सम्मेलन किसके पैसे से हुआ?इससे पहले भी मायावती के पार्क निर्माण, मूर्तियाँ लगाने में किए गए सरकारी धन की बरबादी पर, जन्म दिन मनाने के लिए धन उगाही, तथा जन्म दिन पर हीरे जवाहरात पहनने पर मीडिया में हाय तौबा होती रही है।

मैं मायावती की न समर्थक हू न ही प्रशंसक। पर इतना जानती हूँ कि मायावती वही कर रही हैं जो मनुवादी परंपरा के अनुकूल है। अपने कदम को सही ठहराने के लिए वह अन्य दलों तथा उनके नेताओं के उदाहरण देती है। अभी रविवार को ही एक राष्ट्रीय अखवार के संपादक ने दिल्ली की मुख्य मंत्री के घर की सज्जा तथा लचीज खाने की तारीफ लिखी थी। मैं मानती हूँ कि धन के भौंडे प्रदर्शन और सुरुचिपूर्ण सजावट में फर्क है। परंतु सादा जीवन की परिचायक तो दोनों में से एक भी नहीं है। आज राजनेताओं में ममता बैनर्जी, अशोक गहलोत, ए.के ऐन्टनी जैसे अंगुलियों में गिने जाने वाले नेताओँ को ही मीडिया में सादगी का जीवन व्यतीत करने वालों में शामिल करता है। और तो सभी राजसी ठाट में रहते हैं। उस राजसी ठाट के कुछ नजारे वर्तमान सरकार के दो विदेश मंत्रियों की फिजूल खर्ची में सामने आए और मीडिया के दबाव में उन्हें पाँच सितारा होटल छोड़ने पड़े। यहाँ मीडिया के व्यवहार में एक भिन्नता साफ नजर आती है। सवर्ण नेताओं के मामले में मीडिया सवाल उठाता है, दबाव भी बनाता है पर मामले को उस तरह तूल नहीं देता जिस तरह दलित, आदिवासी नेताओं के अप्रत्याशित मनुवादी व्यवहार को देता है।

मायावती माला प्रकरण से प्रधानतया चार मुद्दे सामने आए। पहला सरकारी तंत्र व धन की बरबादी, दूसरा धन का भौंडा प्रदर्शन, तीसरा धन का स्रोत व चौथा नोटों को तोड़ना मरोड़ना। इसके अलावा गरीबों के हितार्थ कार्यक्रम चलाने के बजाय मूर्तियाँ बनवाने के लिए भी आलोचना होती रहती है। मायावती भर्तसना करने से पहले हमें अपने अंदर झाँकना होगा और खुद से पूछना होगा कि क्या आजाद भारत में तो हर कोई यह चारों काम करने आजाद नहीं है? संसद से लेकर सड़क तक हम में से हर कोई सरकारी तंत्र व धन की बरबादी करता रहता है। सड़क पर कोई हादसा हो जाए, अस्पताल में कोई मर जाए परिजन व आम जनता सार्वजनिक संपत्ति की तोड़ फोड़ कर ही अपना गुस्सा उतारती हैं। भारतीय सेना में कर्नल रहे कर्नल बैसला के नेतृत्व में चले गूजर आंदोलन के दौरान जिस तरह से सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया जिस प्रकार से दूध सड़कों में बहाया गया उससे तो सुप्रीम कोर्ट तक दहल गया था। परंतु किसी ने नहीं कहा कि दूध को सड़क में बहाने के बजाय गरीबों में बाटा जा सकता था। राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय स्तर के नेता अपने साथियों के इस प्रकार के व्यवहार को सही ठहराते नहीं थकते। क्या सभी दलों के अध्यक्ष, सरकारों के मंत्री, सांसद, विधायक, प्रशासक आदि आदि स्वयं अपने व अपने परिजनों के लिए जायज व नाजायज तरीके सारी सरकारी सुविधाएँ व ऊँचे पद नहीं जुटाते हैं? कुछ समय पहले अखबार में पढ़ने को मिला कि एक न्यायाधीश महोदय अपने सरकारी विदेशी दौरे में अपनी पत्नी के लिए भी वही सब सुविधाएँ चाह रहे थे जिसके वे स्वयं हकदार थे। पर कानून इसकी इजाजत नहीं दे रहा था इसलिए सारा विवाद होरहा था। 29, 3, 10 की जनसत्ता में संसद में रेलवे द्वारा चलाई जा रही कैंटीनों में सरकारी अनुदान से परोसे जा रहे सस्ते भोजन के बारे में खबर छपी थी। इन कैंटीनों के प्रबंधन को लिए बनी सभी दलों के सांसदों की समिति को बाजार में बढ़ती कीमतों के अनुसार इन कैंटीनों में परोसे जाने वाले सामान की कीमतों को बढ़ाने की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई।

सांसद, विधायक व स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधि सदन में बहस के माध्यम से सरकार को घेरने के बजाय सदन की कार्यवाही बाधित कर अपना विरोध प्रकट करते हैं। सदन की कार्यवाही नहीं चलने देने से कितने सरकारी धन की बरबादी होती है? जो राजनीतिक दल मायावती की इस सवाल पर आलोचना कर रहे थे उनको कभी भी यह चिंतन करने की आवश्यकता ही महसूस हुई कि वे और उनके दल के लोग किस तरह विभिन्न स्तरों की जन प्रतिनिधि सभाओं का काम बाधित कर कितना सरकारी धन और सुविधाओं का दुरुपयोग करते रहे हैं तथा कितने सरकारी धन का दुरुपयोग इन प्रतिनिधि सभाओं के सत्रों से अनुपस्थित होकर करते हैं। यह हकीकत है कि हर जन प्रतिनिधि सभा के सत्र में कोरम का टोटा हमेशा रहता है।

धन का भौंडा प्रदर्शन तो सदियों पुरानी बीमारी है तथा समाज का हर वर्ग इससे ग्रसित है। अभी हरिद्वार के कुंभ मेले में विभिन्न अखाड़ों ने जो धन संपत्ति का प्रदर्शन किया उसके सामने तो राजनेताओं की संपत्ति फीकी लग रही थी। जो साधु संत सांसारिक मोह माया त्याग कर ईश्वर प्राप्ति ही अपना जीवन लक्ष्य बना चुके हों उनके स्नान को शाही स्नान क्यों कहा जाता है? मुझे समझ नहीं आता। दूसरा, सबसे पवित्र महूर्त को क्यों संतो के स्नान के लिए आरक्षित किया गया है? यह भी मेरी मोटी बुद्धि को समझ नहीं आता। आम धार्मिक गृहस्थ तो संतो की तरह कठिन तप कर मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता इसलिए शायद उसे मोक्ष प्राप्ति के लिए सबसे पवित्र महूर्त में स्नान करने की अधिक आवश्यकता होती है।जबकि संत तो मोक्ष प्राप्त कर चुके होते हैं। उनके तो स्पर्श मात्र से ही हर जल पवित्र हो जाता है। कहने का मतलब है कि आदि काल से ही हमारी पूरी व्यवस्था असमानता व खास के लिए खास सुविधा आरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है। मायावती क्या कर रही है केवल इतना ही कि इस व्यवस्था की चादर को अपने सिर पर भी तान रही है। जब ऊपरी जमात यह करती है तो हमें कोई परेशानी नहीं होती परंतु जब सदियों से दलित बनाए गए लोग करते हैं तो हमें मिर्ची लगती है। हमें गरीब गुरबे याद आते हैं।

हमारे धार्मिक संस्थानों में धन का जब प्रदर्शन होता है तब भी हमें गरीब याद नहीं आते। मुंबई में गणेश उत्सव के बाद हर साल चढ़ावे की खबरें मीडिया में चटकारे ले ले कर बताई जाती हैं। बहुमूल्य रत्न जड़ित आभूषणों के फोटो दिखाए जाते हैं। या अक्सर धनी लोगों द्वारा रत्न जड़ित मुकुट या कुर्सी का चढ़ावा या करोड़ों बड़े बड़े मंदिरों में चढ़ावा मीडिया में खबर बनता है। पर कहीं यह प्रश्न नहीं उठती कि भारत जैसे गरीब देश में इस पूँजी को गरीबी, कुपोषण दूर करने के लिए क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए? यह उस धर्म के अनुयाइयों का हाल है जिस धर्म में जीव मात्र में भगवान के दर्शन होते हैं। पर हम जीव मात्र की पूजा करने के बजाय धन की पूजा करते हैं।

मायावती ने लखनऊ नौएडा में पार्क बनाए मूर्तियाँ लगाई तो उत्तर प्रदेश के गरीब व पिछड़े, समाज के सभी प्रबुद्ध जनों को याद आए। लेकिन मुलायम सिंह जब मुख्यमंत्री थे तब सैफई में क्या कर रहे थे? या अन्य दलों के नेता अपने प्रतीकों पर कितना सार्वजनिक धन संपत्ति बरबाद करते हैं? क्या गरीब या गरीबी केवल उत्तर प्रदेश में है। महाराष्ट्र में कांग्रेस, बीजेपी शिव सेना क्या प्रतीकों की राजनीति नही करते क्या वहाँ गरीब नहीं है।(14वीं लोक साभा व महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव से ऐन पहले महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई में जो शिवाजी की विशालकाय मूर्ति लगाने की घोषणा की थी उस समय महाराष्ट्र के गरीबों या मुंबई के गरीबों की याद किसी ने सरकार को नहीं दिलाई।) दिल्ली में राष्ट्रीय नेताओं के स्मारक बनाने में जो संसाधन लगाए गए यदि उन संसाधनों का उपयोग में हाशिये पर रह रहे लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए किया जाता तो क्या वह उन नेताओं को सच्ची श्रद्धांजलि नहीं होती? दिल्ली में रह रहे अधिकतर लोगों के पास भी जीवन की मूल सुविधाएँ नहीं हैं।

सिविल सोसाइटी भी गरीबों को हाशिए में रखने में विश्वास करती है। पिछली शताब्दी के नब्बे के दशक में भारत के लगभग सभी बड़े शहरों में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर उद्योगों को बंद कर दिया गया। लाखों मजदूर बेरोजगार होगए। इसी बहाने गरीबों की झुग्गियाँ तोड़ी जाती हैं। सिविल सोसाइटी ने पर्यावरण के नाम पर इस कदम को सराहा। परंतु जब धार्मिक उत्सवों के बाद मूर्ति व पूजा सामग्री विसर्जन से नदियों, तालावों व समुद्र का पानी प्रदूषित होता है। फटाकों से ध्वनि प्रदूषण होता है। वायु प्रदूषण होता है। सिविल सोसाइटी आँख मूँद लेती है। मीडीया में हर साल पिछले साल से बड़ी मूर्तियाँ या सबसे बड़ी मूर्ति लगाने का दावा धार्मिक संस्थाएँ करती हैं। श्रद्धा में डूबे लोगों से पर्यावरण प्रदूषण के बारे में कोई नहीं पूछता। यहाँ पर भी खास लोगों के लिए खास सुविधाएं वाला सिद्धांत ही लागू होता है। बूढ़े़, बीमार व अशक्त पर इस पर्यावरण प्रदूषण का असर सर्वाधिक पड़ता है। बूढ़े़, बीमार व अशक्त भी तो एक तरह से हाशिये के लोग ही तो हैं। गरीबों में इनकी तादाद अधिक होती है। हम मानव कल्याण की बात तो करते हैं पर काम नहीं। हमें भी गरीब को तभी याद करते हैं जब मायावती व अन्य दलित धन प्रदर्शन करते हैं।

मैं मायावती का समर्थन या बचाव नहीं कर रही हूँ। गलत काम गलत है चाहे गलती कोई भी करे। परंतु यदि गल्ती करना हमारी आदत बन गई हो और इसको सामाजिक मान्यता मिल गई हो तो मामला गंभीर हो जाता है। हमें समरथ को नहीं दोष गोसाईं वाली मानसिकता को समाप्त करना होगा। मायावती से पहले सदियों से चले आ रहे समाज के उन कर्णधारों को खास से आम बनना होगा जिनको मायावती के खास बनने पर आम जन की याद आती है। ऐसा किये बगैर मायावती की आलोचना करना महज अपने मनुवादी दुराग्रहों को अभिव्यक्ति देना ही होगा।

2 comments:

honesty project democracy said...

उम्दा सोच पर आधारित प्रस्तुती के लिए धन्यवाद / ऐसे ही सोच की आज देश को जरूरत है / आप ब्लॉग को एक समानांतर मिडिया के रूप में स्थापित करने में अपनी उम्दा सोच और सार्थकता का प्रयोग हमेशा करते रहेंगे,ऐसी हमारी आशा है / आप निचे दिए पोस्ट के पते पर जाकर, १०० शब्दों में देश हित में अपने विचार कृपा कर जरूर व्यक्त करें /उम्दा विचारों को सम्मानित करने की भी व्यवस्था है /
http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html

bishu said...

bat sahi hai
is per ek sher

Wo Salibon Ke karib Aaye to,
Kayede Kanoon Samjhane lage hain.