17 February, 2010

डॉ. धर्मवीर की 'प्रेमचंद- सामंत का मुंशी'

डॉ. धर्मवीर की पुस्तक ‘प्रेमचंद: सामंत का मुंशी’ उनकी ‘मातृसत्ता, पितृसत्ता और जारसत्ता’ पर पुस्तक शृंखला की तीसरी पुस्तक है. पुस्तक का नाम देखकर ऐसा लगता है कि इसमें शायद प्रेमचंद के कथा साहित्य की एक नई दृष्टि से व्याख्या होगी. परंतु ऐसा है नहीं. इस किताब का प्रेमचंद के साहित्य से कुछ खास लेना देना नहीं है. वह तो यों ही बीच बीच में छिटपुट आ जाता है. डॉ. धर्मवीर प्रेमचंद की कहानी ‘कफ़न’ का जिक्र करते हुए घीसू और माधव के अमानवीय व्यवहार को उनका विद्रोह बताते हुए कहते हैं— ‘सारी कहानी नए सिरे से स्पष्ट हो जाती यदि प्रेमचंद इस कहानी की आखरी लाइन में दलित जीवन का यह सच लिख देते कि बुधिया गाँव के जमीदार के लोंडे से गर्भवती थी. उसने बुधिया से खेत में बलात्कार किया था. तब, शब्द दीपक की तरह जल उठते और सब कुछ समझ में आ जाता. अपेक्षा ज्यादा की थी लेकिन घीसू और माधव इतना ही विद्रोह कर सके थे कि जमींदार के बच्चे को अपना बच्चा नहीं कहेंगे. यह असली पीड़ा है. दलित का असली शोषण यह है कि कई बार उसकी कथित औलाद उसकी असल औलाद नहीं है. इस शोषण के सामने आर्थिक शोषण कितना छोटा पड़ जाता है!’ (पृ.17) वे आगे कहते हैं—‘क्या बेहतर है—बुधिया और बुधिया के बच्चे को मरने देना—या दूसरों की औलाद को अपनी कह कर पालना.’ (पृ.29)

जबकि प्रेमचंद अपनी कहानी ‘कफन’ में घीसू और माधव के अमानवीय चरित्र का कारण बताते हुए लिखते हैं—‘जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज्यादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी.’ (पृ.19)

लेकिन इससे डॉ. धर्मवीर को क्या? प्रेमचंद का उनका मूल्यांकन प्रेमचंद की दूसरी पत्नी शिवरानी देवी के संस्मरण- ‘प्रेमचंद: घर में’ में दी गई एक घटना पर आधारित है. जिसमें प्रेमचंद कहते हैं- ‘अच्छा एक और चोरी सुनो. मैंने अपनी पहली स्त्री के जीवन-काल में ही एक और स्त्री रख छोड़ी थी. तुम्हारे आने पर भी उससे मेरा संबंध था.’(पृ.24) उनके अनुसार—‘यह हुआ प्रेमचंद के पारिवारिक जीवन का हिसाब-किताब—दो पत्नियाँ और एक रखैल और बाकी...? यह शरण कुमार लिंबाले जैसे दलित लेखकों की जन्मकुंडली है. वे ऐसे ही पैदा होते हैं.’ (पृ.29) और ‘यदि इन दो ब्याहताओं के अलावा उस तीसरी औरत के पेट से प्रेमचंद का बच्चा जन्मा हो तो वह औरत अपने ससुर और पति के लिए घीसू और माधव की बुधिया बन कर रह जाती है.’(पृ.26) डॉ. धर्मवीर आगे कहते हैं- ‘बताइए, हिंदी के इस महान कहे जाने वाले लेखक ने ताउम्र चोरी की! सेक्स का चोर साहित्य लिख रहा है.’ (पृ.27) और ‘यदि वह तीसरी औरत उनकी रखैल थी तो उसका भरण-पोषण भी किया होगा. तब हो गया न डबल खर्चा. फिर हो गए न जमींदार सिद्ध. फिर किसी लेखक की गरीबी के रोने कैसे?’ (पृ.26-27) और ‘मैं उन्हें साहित्यिक जमींदार कहना चाहता हूँ. साहित्यिक जमींदार ही रखैल रख सकते थे जो उन्होंने सच में रख रखी थी.’ (पृ.43-44)

लेकिन प्रेमचंद ही क्यों पूरा हिंदू समाज और उसका कानून ही इस जारकर्म के लिए दोषी है. वे कहते हैं—‘उनका (प्रेमचंद) हिंदू कानून एक बुरा कानून था, इसीलिए प्रेमचंद रखैल रखने की जुर्रत कर सके. उनके हिंदू कानून में हर पति जमींदार और सामंत होता है.’ (पृ.28) उनके अनुसार—‘किसी भी हिंदू पुरुष या हिंदू स्त्री को विवाह या पुनर्विवाह के शब्दों का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है. इन्हें विवाह या पुनर्विवाह के कायदे-क़ानूनों का क्या पता जब उस दौरान इनके लिए जारकर्म कानूनी रूप में अनुमत रहता है. इसलिए हिंदुओं के विवाह को विवाह न कह कर विवाह+जारकर्म कहा जाए तो सच्चाई के ज्यादा नजदीक जाया जा सकता है.’ (पृ. 26)

इस पुस्तक में प्रेमचंद के मूल्यांकन का आधार उनका साहित्य न हो कर उनका चरित्र है. वे कहते हैं—‘भारत के जातीय वातावरण में किसी लेखक की जाति जानने से उसके साहित्य को समझने में काफी मदद मिलती है.’ (पृ.13) उन्हें बुधिया की पीड़ा से ज्यादा चिंता प्रेमचंद की तीसरी औरत को खोजने की है और इस यज्ञ में वे सभी को शामिल करवाना चाहते हैं—‘प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पीएचडी की उपाधि के लिए सैंकड़ों शोध कार्य हो चुके हैं,--क्या उनमें से किसी ने इस बाबत खोज की है?’ (पृ.30) यानी डॉ. धर्मवीर कह रहे हैं कि किसी व्यक्ति के साहित्य का मूल्यांकन उसके साहित्य के आधार पर न करके उसके व्यक्तिगत चरित्र के आधार पर किया जाए. इसका मतलब हुआ कि कोई किताब पढ़ने से पहले हमें लेखक की जाति और निजी जीवन की जाँच करानी चाहिए. यदि जाँच रिपोर्ट हमारे मन माफिक हो तभी उस किताब को पढ़ना चाहिए.
डॉ. धर्मवीर ने अपना पूरा तर्क इस एक बात पर खड़ा किया है. और यहाँ से वे अपनी ‘महान’ खोज जार कर्म की ओर जाते हैं. दलितों की स्थिति का बखान करते हुए डॉ. धर्मवीर कहते हैं—‘दलित की मुसीबतों का एक पूरा दलित शास्त्र हुआ करता है. यह दलित शास्त्र क्या है और किस हद तक लागू होता है? मोटे रूप में यह शास्त्र दो चीजों से बना है. ...पहला, दलित पुरुषों के साथ अस्पृश्यता और दलित नारियों के साथ बलात्कार और जारकर्म—ये इसके दो बड़े विभाजन हैं. ये किस हद तक लागू होते हैं? ये दोनों शत-प्रतिशत लागू होते हैं क्योंकि ये जातीय आधार पर हैं, व्यक्तिगत आधार पर नहीं.’ (पृ.19) दरअसल इस पुस्तक का विषय प्रेमचंद का साहित्य न हो कर जारसत्ता है. दिलचस्प बात यह है कि डॉ. धर्मवीर पूरी पुस्तक में जारसत्ता के उदाहरण तो पेश कर रहे हैं पर वे इनके मूल कारणों की पड़ताल नहीं कर रहे हैं. उनके उदाहरण तिलमिला देने वाली भाषा में अपने विरोधियों का मजाक उड़ाने वाले हैं.

डॉ. धर्मवीर सवर्णों के बारे में अपने पावन विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं—‘द्विज के सामने मोरल की बात कही जाएगी तो वह घर छोड़कर संन्यासी तो बन सकता है लेकिन पारिवारिक और वैवाहिक जीवन में सदाचारी नहीं बनेगा. उसके संस्कार की कुछ बुनावट ही ऐसी है कि वह गृहस्थ जीवन में रखैल, वेश्या और परस्त्री के साथ के जारकर्म से रुक नहीं रहा है. इसे कौन समझाए,--नहीं, इसके प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों को कौन समझाए.’ (पृ.30)

वैसे तो उन्हें स्त्री मात्र से चिड़ है, जो इनके पुराने लेखन से और इसी शृंखला की दूसरी पुस्तक के ‘तीन हिंदू स्त्री लिंगों का चिंतन’ के नाम तक से जाहिर होती है, पर दलित लेखिकाओं से उन्हें खास आपत्ति है. वे कहते हैं--‘मुझे और भी बुरा लगता है जब कोई दलित नारी गैर-दलित पुरुष का बचाव करती है, अब वह अनिता भारती हों या कोई और. अनिता भारती प्रेमचंद के रूप में एक जार पुरुष की प्रशंसा कर रही हैं.’(पृ.51) और ये ‘दलित महिला के यौन-शोषण को कितने हल्के ढंग ले रही हैं. बस, इनकी तरफ से यही कहने की कमी रह गई है कि द्विज लोग दलित स्त्रियों का शोषण नहीं करते हैं बल्कि उन पर उपकार करके और उन्हें गर्भवती करके उन्हें संतान देते हैं. क्या अनिता भारती बुधिया बनना चाह रही हैं. मुझे नहीं लगता कि उस बेचारी का कोई दोष था लेकिन अनिता भारती की सोच में निश्चित रूप से भारी खोट है. जब स्त्री का यौन शोषण हो गया तो घर लुट गया. तब चमारी के गर्भ से जमीदार की औलाद पलेगी. फिर, क्या न्यूनतम मजदूरी का सवाल और किसके बच्चों के लिए शिक्षा? तब क्या नारी के अधिकार बनते हैं जब पुरुष के पास देने को ही कुछ नहीं बचा है?’(पृ.66) डॉ. धर्मवीर के मुताबिक दलित समस्या की जड़ गरीबी या असमानता नहीं बल्कि दलित औरत का यौनाचार है—‘मामला गरीबी तक सीमित नहीं है, --मामला गरीबी का बिलकुल नहीं है—बल्कि दलित औरतों के यौनाचार की गुलामी का है.’(पृ.16)

पाठकगण, आप भी जानें कि अनिता भारती ने ऐसा क्या लिख दिया जिससे डॉ. धर्मवीर को उनकी सोच में भारी खोट दीख रहा है—‘सवाल उठता है कि दलित साहित्यकार स्त्री के यौन शोषण या बलात्कार से, सवर्णों के उन पर आधिपत्य से इतने आतंकित क्यों हैं? क्यों बार-बार लेखन का विषय दलित स्त्री का शोषण बनता है. जबकि दलित लेखिकाओं का कलेवर अत्यंत विस्तृत है. वह दलित स्त्री के अस्तित्व से ले कर, न्यूनतम मजदूरी, शिक्षा, उनके अपने समाज द्वारा हड़पे गए अधिकारों तक को उन्होंने अपने साहित्य का विषय बनाया है. दलित स्त्री की केवल और केवल समस्या यौन शोषण ही तो नहीं है.’(पृ.65-66)

सच कहें तो मामला दलित स्त्रियों या हिंदुओं के जारकर्म का नहीं, भारत के प्रगतिशील विचारकों और चिंतकों को घेरने का, उनकी छवि धूमिल करने का है. नहीं तो लेना एक न देना दो, नेहरू जी को लपेटने का क्या बढ़िया तर्क दिया है—‘पंडित जवाहर लाल नेहरू नाम के ब्राह्मण को मुफ्त में प्रगतिशील होने का खिताब दिलवा देती है जबकि नेहरू एक ब्राह्मण होने के नाते हिंदू कोड बिल के मामले में पूरे पिछड़े हुए आदमी थे.’ (पृ.15) वे पहले भी हजारी प्रसाद द्विवेदी, मैनेजर पाण्डेय, पुरुषोत्तम अग्रवाल आदि प्रगतिशीलों की खबर ले चुके हैं.

वे अपनी कृपादृष्टि दलित स्त्रियों या सवर्ण प्रगतिशीलों पर ही नहीं भगवान बुद्ध पर भी डालते हैं—‘ प्राचीन भारत में बुद्धं शरणं गच्छामि करने वाले उन बौद्ध भिक्षुओं की इतनी लंबी कतार क्या थी? अध्यात्म की खोज और प्राप्ति की बात होती तो दो-चार लोग घऱ-बार छोड़ कर भिक्षु, अर्हत या संन्यासी बन जाते. इतने सारे लोग अपने घरों को छोड़कर आध्यात्मिक क्यों बन गए हैं? ध्यान रहे, संन्यासियों ने घर-बार ही नहीं छोड़ा है, बल्कि समाज और राष्ट्र भी छोड़ा है. संन्यास का दूसरा नाम सामाजिक मृत्यु है. ऐसे कानून से व्यक्ति के लिए संन्यास से ही जिन्दा रहने का एकमात्र रास्ता निकलता है. लेकिन उसमें राष्ट्र लुट जाता है—तब वह विदेशियों के हाथों में चला जाता है.’ (पृ.48) यानी कि भारत की मुसलमानों के आगे हार में बौद्धों का प्रभाव था तो भइया ईसाइयों के समय हार में कौन-सा बौद्ध धर्म आड़े आया, जरा ये भी बता देते तो बहुत अच्छा होता. पाठको, सच्चाई तो ये है कि भारत की हार का मुख्य कारण इसका जातियों और छोटे-छोटे रजवाड़ों में बँटा होना था. लेकिन यहीं तक इति नहीं है डॉ. धर्मवीर की पावन दृष्टि से डॉ. अंबेडकर भी बच नहीं पाए हैं-- ‘यदि बाबा साहेब के पास उस समय भारत के तमाम दलित संतों का साहित्य उपलब्ध होता तो वे बुद्ध की शरण में जाने के बजाय अपने संतों के ढिग बैठते.’ जब डॉ. अंबेडकर को नहीं बख्शा तो बेचारे प्रेमचंद की क्या बिसात.

अरुण शौरी की इतिहासकारों पर एक किताब है—‘एमिनेंट हिस्टोरियन्स: देअर टेक्नोलॉजी, देअर लाइन, देअर फ्राड’. इस किताब में उसने सभी महत्त्वपूर्ण साम्यवादी इतिहासकारों की कटु आलोचना की है. पाठकगण, उनकी इतिहास संबंधी अवधारणाओं की नहीं, उनके टीए-डीए बिलों और अनुदानों के हेर-फेर की. ये बातें भी कितनी तथ्य आधारित है ये तो विभाग की गोपनीय फाइलें ही बता पाएँगी. कमोबेश यही पद्धति अरुण शौरी ने डॉ. अंबेडकर पर लिखी अपनी किताब ‘वर्शिपिंग फाल्स गॉड्स’ में अपनाई है. और ठीक यही पद्धति डॉ. धर्मवीर ने इस पुस्तक में प्रेमचंद पर अपनाई है.

आइए, इसके बरक्स जरा ये भी जानें कि डॉ. अंबेडकर जार कर्म पर क्या कहते हैं. अपनी पुस्तक ‘बुद्ध या कार्लमार्क्स’ (सेवास्तंब एवं संजीवैय्या इंस्टीट्यूट ऑफ सोशियो इकनोमिक स्टडीज़, दिल्ली द्वारा प्रकाशित, पृ.35) में बुद्ध को उद्धृत करते हुए कहते हैं—‘(15) और बंधुओं, इसलिए, दीन-हीनों, दरिद्रों को वस्तुएँ व माल न दिए जाने से निर्धनता फैली, उसका विस्तार हुआ, चोरी, हिंसा, हत्या, झूठ, बुराई करना आदि जैसी बातें प्रचुर मात्रा में बढ़ गई. (16) झूठ बोलने से जार कर्म में वृद्धि हुई. (17) इस प्रकार दीन-हीनों, दरिद्रों को माल व वस्तुएँ न दिए जाने के कारण निर्धनता... ए चोरी... हिंसा... झूठ... चुगलखोरी... अनैतिकता फैली, उसका विस्तार हुआ. (18) बंधुओं उनके बीच तीन चीजों की वृद्धि हुई. ये थीं, कौटुंबिक व्यभिचार, अनियंत्रित लालच तथा विकृत लोभ’.

यानी कि भगवान बुद्ध और डॉ. अंबेडकर के अनुसार व्यभिचार या जार कर्म का कारण आर्थिक असमानता और उससे उपजी निर्धनता है. यही बात कार्ल मार्क्स ने ‘अर्थशास्त्र और दर्शन संबंधी 1844 की पांडुलिपियाँ’, (इंडिया पब्लिशर्स, लखनऊ, 1981, पृ. 38-39) में फ्रांसीसी दार्शनिक व समाजशास्त्री पेक्वेअर कांसतेंतिन को उद्धृत करते हुए कहा है—‘इस तरह की आर्थिक व्यवस्था मनुष्यों को ऐसे अधम पेशों में काम करने के लिए मजबूर करती है. ऐसी भयानक और कटुतापूर्ण अधोगति की ज़िंदगी जीने के लिए विवश करती है कि इसकी तुलना में, बर्बर मनुष्य का जीवन भी राजकीय ठाटबाट वाला प्रतीत होता है. संपत्ति-विहीन वर्ग के साथ सभी रूपों में व्यभिचार किया जाता है.’

संक्षेप में, जहाँ मार्क्स और अंबेडकर व्यभिचार या जारकर्म के लिए निर्धनता और असमानता को दोषी ठहराते हैं तथा वहीं डॉ. धर्मवीर उच्च जातियों की हिंदू मानसिकता को इसका दोष देते हैं. दरअसल उनकी दिक्कत यह है कि उन्होंने अपने शत्रु तय कर लिए हैं. उनके वैचारिक संहार के लिए वे तर्कों के हथियार लेकर घूम रहे हैं, चारों ओर कत्लेआम मचाते हुए. यही कारण है कि दलित स्त्रियों का यौन शुचिता के अलावा दूसरे मुद्दों पर बात करना इन्हें नागवार गुजरता है.

जिस व्यक्तिगत नैतिकता पर डॉ. धर्मवीर और अन्य फासीवादी इतना ज़ोर देते हैं, उस पर जर्मन कवि बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की एक कविता याद आती है—
मैंने सुना है, प्रधान मंत्री पीता नहीं है
वह नहीं खाता मांस और नहीं करता धूम्रपान
और वह रहता है एक छोटी सी कोठी में.
पर मैंने यह भी सुना है, ग़रीब
भूखों मर रहे और गल रहे कंगाली में.
क्या ही बेहतर होता राज्य वह, जहाँ यह कहा जाता:
प्रधान मंत्री धुत्त बैठता है कैबिनेट की बैठकों में,
अपने पाइपों से निकलते धुएँ को घूरते, कानून बदलते हैं
कुछेक अनपढ़ बैठे-बैठे.
ग़रीब नहीं हैं.

किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व का सार्वजनिक आचरण और मूल्यबोध ही महत्त्वपूर्ण होता है. क्योंकि वही समाज को प्रभावित करता है. अक्सर निजी जीवन में व्यक्तिगत नैतिकता को अतिरेक की हद तक महत्व देने वाले लोग सार्वजनिक जीवन में बेहद क्रूर होते हैं या क्रूर और अमानवीय नीतियों का मौन/मुखर समर्थन करते पाए जाते हैं. जैसे औरेंगजेब और अडवाणी.

हालाँकि डॉ. धर्मवीर इसे भी अनैतिकता के समर्थन में मान सकते हैं. पर इसका किया ही क्या जा सकता है. उनकी दृष्टि से देखें तो कई सवालों पर उनकी राय आना अभी बाकी है. जिन दलित स्त्रियों ने सवर्ण पुरुषों से विवाह किया वे तो उनके अनुसार बलातकृता और रखैल हैं तो जिन दलित पुरुषों ने सवर्ण स्त्रियों से विवाह किया उन सवर्ण स्त्रियों को वे क्या मानते हैं और उन दलित पुरुषों के बारे में उनका क्या नज़रिया है. और जिन दलित पुरुषों ने अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति मजबूत होने के चलते दलित या सवर्ण स्त्रियों से जार कर्म किया है, उन पर उनकी राय क्या है.

दरअसल डॉ. धर्मवीर की समझ सिर के बल खड़ी है. वे हिंदू धर्म के ब्राह्म विवाह को कारण और जार कर्म को उसका परिणाम मान रहे हैं. इसीलिए वे हिंदू कोड बिल के सख्ती से लागू किए जाने को सारी समस्याओं का हल मान रहे हैं. जबकि वास्तविकता यह है कि दलितों का यौन शोषण उनकी आर्थिक-समाजिक स्थितियों के कारण होता है, हिंदू धर्म के मनुस्मृति सरीखे ग्रंथ इसके कारण नहीं, केवल स्थिति को रेखांकित करने वाले हैं. इनका विरोध– ढोर, गंवार, सूद्र, पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी—जैसी इक्का दुक्का टिप्पणियों के आधार पर न करके, उनकी मूल असमानता वादी दृष्टि के आधार पर करना चाहिए. इसीलिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष श्री सूरजभान की यह माँग की कि हिंदुओं को अपने धर्म ग्रंथों से ऐसी टिप्पणियों को निकाल देना चाहिए. हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को रास आती है, दलितों को नहीं.

जातिवाद की समस्या का हल बताते हुए डॉ. अंबेडकर कहते हैं—‘समाज का लक्ष्य एक नवीन नींव डालने का होना चाहिए, जिसे फ्रांसीसी क्रांति द्वारा संक्षेप में तीन शब्दों में—समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा—कहा गया है.’ (बुद्ध या कार्ल मार्क्स, पृ.40) इतना ही नहीं, ‘डॉ. अंबेडकर जाति व्यवस्था का प्रतिपक्ष सामाजिक जनतंत्र—सोशल डेमोक्रेसी को मानते थे. राजनैतिक जनतंत्र और सामाजिक जनतंत्र के बीच बिल्कुल ठीक फर्क करते हुए वे राजनीतिक जनतंत्र को सामाजिक जनतंत्र को स्थापित करने का साधन मानते थे.’ (पुरुषोत्तम अग्रवाल, अकबर नाम लेता है खुदा का... , तद्भव, अप्रैल 2003, पृ.54) इसीलिए डॉ. अंबेडकर ने इस देश में अपने संविधान के द्वारा राजनैतिक जनतंत्र स्थापित किया और सामाजिक जनतंत्र का रास्ता खोला.

डॉ. अंबेडकर अपने प्रसिद्ध भाषण – जातिभेद का उच्छेद – में जातिवाद को तोड़ने का सबसे ताकतवर हथियार अंतर्जातीय विवाह को मानते हैं. और डॉ. धर्मवीर को दलित महिलाओं का अंतर्जातीय विवाह की बात करना दलित कौमों का मजाक उड़ाना लगता है—‘तब अनिता भारती क्या कह रही हैं? दलित कौमें हारी हुई हैं—और इसका सबसे खतरनाक अर्थ यह है कि उनकी औरतें उनकी नहीं हैं. इसलिए, जब कोई दलित नारी जात तोड़ने की बात कहती है तो लगता है मानों वह दलित कौमों की ज्यादा मजाक उड़ा रही है क्योंकि तब गैर दलितों द्वारा उड़ाई मजाक कम पड़ती है.’ (पृ.53) इतना ही नहीं वे सामाजिक शिष्टाचार का उल्लंघन करते हुए व्यक्तिगत टिप्पणी करते हैं—‘अनिता भारती दलित पुरुषों से अलग से क्या चाहती हैं? दलित स्त्रियों को रखैल, वेश्या और देवदासी बना कर यौन मामलों में उनकी जात पूरी तरह तोड़ दी गई है. इसलिए, ऐसी सोच की स्त्री यदि अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहती है तो गैर-दलितों से लड़े. रखैल के रूप में अधिकार माँगे, वेश्या के रूप में दाम बढ़वाए और देवदासी के रूप में पुजारी की संपत्ति में हाथ मारे—यहाँ दलित पुरुष के पास क्या रखा हैं? जब दलित की पत्नी जमीदार के रह रही हो और जमीदार से अपने बच्चे पैदा कर रही हो तो दलित पति से मिलने वाले उसके कौन से अधिकार सृजित होते हैं? तब जो भी उसके अधिकार बनते हैं वे जमीदार की तरफ से बनते हैं. तो वहाँ लड़े, यहाँ क्या कर रही है?’ (पृ.67) डॉ. धर्मवीर दलित साहित्यकारों को रास्ता दिखा रहे हैं कि वे क्या लिखें--‘दलित साहित्य उसे ही कहा जाएगा जिसमें पारिवारिक जीवन में तलाक की अनुमति हो, स्त्री के लिए भरण-पोषण पर रोक लगे तथा जारकर्मी को जारकर्म की जिम्मेदारी से नवाजा जाए.’ (पृ.53).

दलित लेखकों और चिंतकों के सामने डॉ. अंबेडकर का अधूरा कार्य पड़ा है. सामाजिक जनतंत्र और आर्थिक समानता की स्थापना का. डॉ. अंबेडकर एक पुस्तक लिख रहे थे—क्रांति और प्रतिक्रांति की संकल्पना पर. आज प्रतिक्रांति की ताकतें प्रबल हैं. यह फैसला दलित लेखकों और चिंतकों को करना है कि वे किस तरफ हैं.

4 comments:

रंगनाथ सिंह said...

आपका लेखन पसंद आया। क्या मैं आपके लेख अपने ब्लाग पर लगा सकता हूं ?

वेद प्रकाश said...

रंगनाथ सिंह जी, आप बेशक अपने ब्लॉग पर मेरा लेख लगा सकते हैं,यदि साथ में मेरे ब्लॉग का लिंक भी देंगे तो बेहतर होगा

रंगनाथ सिंह said...
This comment has been removed by the author.
NARENDRA ARYA said...

वेड प्रकाश जी आपकी पुस्तक समीक्षा अच्छी लगी .मैं यहाँ प्रेमचंद के ऊपर तो टिपण्णी नहीं करूँगा किन्तु डॉ.धर्मवीर के आलोचनात्मक पद्धति और तर्किकीकरण का तरीका वाकई किसी भी तरह से दलित चिंतन के अनुकूल नहीं है.