<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1713771972607997617</id><updated>2011-11-05T01:47:12.400+05:30</updated><category term='http://blogvani.com/logo.aspx'/><title type='text'>लोक मित्र</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://lokmitr.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1713771972607997617/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lokmitr.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>वेद प्रकाश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13067846901937499742</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCSwp1kYnLQ/R7pXzEJLAEI/AAAAAAAAAAY/JZYuaNR5tzE/S220/DSC00584.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>9</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1713771972607997617.post-2638082789502568904</id><published>2010-04-25T19:38:00.004+05:30</published><updated>2010-05-07T22:37:46.547+05:30</updated><title type='text'>मायावती ही शिकार क्यों?</title><content type='html'>डॉ.गोपा जोशी के ब्लॉग वर्तमान भारतीय राजनीति से साभार&lt;br /&gt;http://gopajoshi2010.blogspot.com/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;15-16 मार्च 2010 को उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री मायावती ने अपने विरोधियों तथा मनुवादी समाज को दिल भर के चिढ़ाया। 15 मार्च को माया को (बकौल कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के प्रभारी दिग्विजय सिंह के) दस मीटर लंबी हजार रुपए के नोटों की माला पहनाई गई थी। एक रपट के अनुसार इस माला में 50000 नोट लगे थे। सारे टी वी चैनल हतप्रभ थे। एक ऐंकर ने तो स्वामी रामदेव से वादा भी ले लिया कि राजनीति में आने के बाद स्वामी जी नोटों की माला नहीं पहनेंगे। (क्या वादा निभाने कभी कोई राजनीति में आता है?) राजनीतिज्ञों तथा मीडिया की हायतौबा को धत्ता बताते हुए मायावती ने 16 मार्च को फिर 18 लाख रुपये की नोटों की माला पहन ली। साथ ही अपने समर्थकों से घोषणा भी करवा दी कि भविष्य में मायावती का स्वागत उनके दल के लोग नोटों की माला पहना कर ही करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;15-16 की शाम प्राइम टाइम में करीब करीब सभी चैनलों ने माला प्रकरण में बहस मुबाहिसे करवाए। इन बहसों में भाग लेने वाले अधिकतर विशेषज्ञ भी नोटों की माला प्रकरण से क्षुब्ध थे। केवल दलित विशेषज्ञों को ही इसमें कुछ भी अनुचित नहीं लग रहा था। इससे पहले रैली के लिए नगर की साज सज्जा, प्रकाश तथा रैली भाग लेने वालों के खाने पीने के विस्तृत इंतजाम पर भी अंगुली उठ रही थी। कारण यह सब सरकारी पैसे से हो रहा था। क्या लालू के महा रैला निजी धन खर्च कर होते थे? या अन्य सत्ताशीन दल अपने पैसे से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। इंदौर में बीजेपी का सम्मेलन किसके पैसे से हुआ？इससे पहले भी मायावती के पार्क निर्माण, मूर्तियाँ लगाने में किए गए सरकारी धन की बरबादी पर, जन्म दिन मनाने के लिए धन उगाही, तथा जन्म दिन पर हीरे जवाहरात पहनने पर मीडिया में हाय तौबा होती रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं मायावती की न समर्थक हू न ही प्रशंसक। पर इतना जानती हूँ कि मायावती वही कर रही हैं जो मनुवादी परंपरा के अनुकूल है। अपने कदम को सही ठहराने के लिए वह अन्य दलों तथा उनके नेताओं के उदाहरण देती है। अभी रविवार को ही एक राष्ट्रीय अखवार के संपादक ने दिल्ली की मुख्य मंत्री के घर की सज्जा तथा लचीज खाने की तारीफ लिखी थी। मैं मानती हूँ कि धन के भौंडे प्रदर्शन और सुरुचिपूर्ण सजावट में फर्क है। परंतु सादा जीवन की परिचायक तो दोनों में से एक भी नहीं है। आज राजनेताओं में ममता बैनर्जी, अशोक गहलोत, ए.के ऐन्टनी जैसे अंगुलियों में गिने जाने वाले नेताओँ को ही मीडिया में सादगी का जीवन व्यतीत करने वालों में शामिल करता है। और तो सभी राजसी ठाट में रहते हैं। उस राजसी ठाट के कुछ नजारे वर्तमान सरकार के दो विदेश मंत्रियों की फिजूल खर्ची में सामने आए और मीडिया के दबाव में उन्हें पाँच सितारा होटल छोड़ने पड़े। यहाँ मीडिया के व्यवहार में एक भिन्नता साफ नजर आती है। सवर्ण नेताओं के मामले में मीडिया सवाल उठाता है, दबाव भी बनाता है पर मामले को उस तरह तूल नहीं देता जिस तरह दलित, आदिवासी नेताओं के अप्रत्याशित मनुवादी व्यवहार को देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मायावती माला प्रकरण से प्रधानतया चार मुद्दे सामने आए। पहला सरकारी तंत्र व धन की बरबादी, दूसरा धन का भौंडा प्रदर्शन, तीसरा धन का स्रोत व चौथा नोटों को तोड़ना मरोड़ना। इसके अलावा गरीबों के हितार्थ कार्यक्रम चलाने के बजाय मूर्तियाँ बनवाने के लिए भी आलोचना होती रहती है। मायावती भर्तसना करने से पहले हमें अपने अंदर झाँकना होगा और खुद से पूछना होगा कि क्या आजाद भारत में तो हर कोई यह चारों काम करने आजाद नहीं है? संसद से लेकर सड़क तक हम में से हर कोई सरकारी तंत्र व धन की बरबादी करता रहता है। सड़क पर कोई हादसा हो जाए, अस्पताल में कोई मर जाए परिजन व आम जनता सार्वजनिक संपत्ति की तोड़ फोड़ कर ही अपना गुस्सा उतारती हैं। भारतीय सेना में कर्नल रहे कर्नल बैसला के नेतृत्व में चले गूजर आंदोलन के दौरान जिस तरह से सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया जिस प्रकार से दूध सड़कों में बहाया गया उससे तो सुप्रीम कोर्ट तक दहल गया था। परंतु किसी ने नहीं कहा कि दूध को सड़क में बहाने के बजाय गरीबों में बाटा जा सकता था। राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय स्तर के नेता अपने साथियों के इस प्रकार के व्यवहार को सही ठहराते नहीं थकते। क्या सभी दलों के अध्यक्ष, सरकारों के मंत्री, सांसद, विधायक, प्रशासक आदि आदि स्वयं अपने व अपने परिजनों के लिए जायज व नाजायज तरीके सारी सरकारी सुविधाएँ व ऊँचे पद नहीं जुटाते हैं? कुछ समय पहले अखबार में पढ़ने को मिला कि एक न्यायाधीश महोदय अपने सरकारी विदेशी दौरे में अपनी पत्नी के लिए भी वही सब सुविधाएँ चाह रहे थे जिसके वे स्वयं हकदार थे। पर कानून इसकी इजाजत नहीं दे रहा था इसलिए सारा विवाद होरहा था। 29, 3, 10 की जनसत्ता में संसद में रेलवे द्वारा चलाई जा रही कैंटीनों में सरकारी अनुदान से परोसे जा रहे सस्ते भोजन के बारे में खबर छपी थी। इन कैंटीनों के प्रबंधन को लिए बनी सभी दलों के सांसदों की समिति को बाजार में बढ़ती कीमतों के अनुसार इन कैंटीनों में परोसे जाने वाले सामान की कीमतों को बढ़ाने की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सांसद, विधायक व स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधि सदन में बहस के माध्यम से सरकार को घेरने के बजाय सदन की कार्यवाही बाधित कर अपना विरोध प्रकट करते हैं। सदन की कार्यवाही नहीं चलने देने से कितने सरकारी धन की बरबादी होती है? जो राजनीतिक दल मायावती की इस सवाल पर आलोचना कर रहे थे उनको कभी भी यह चिंतन करने की आवश्यकता ही महसूस हुई कि वे और उनके दल के लोग किस तरह विभिन्न स्तरों की जन प्रतिनिधि सभाओं का काम बाधित कर कितना सरकारी धन और सुविधाओं का दुरुपयोग करते रहे हैं तथा कितने सरकारी धन का दुरुपयोग इन प्रतिनिधि सभाओं के सत्रों से अनुपस्थित होकर करते हैं। यह हकीकत है कि हर जन प्रतिनिधि सभा के सत्र में कोरम का टोटा हमेशा रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन का भौंडा प्रदर्शन तो सदियों पुरानी बीमारी है तथा समाज का हर वर्ग इससे ग्रसित है। अभी हरिद्वार के कुंभ मेले में विभिन्न अखाड़ों ने जो धन संपत्ति का प्रदर्शन किया उसके सामने तो राजनेताओं की संपत्ति फीकी लग रही थी। जो साधु संत सांसारिक मोह माया त्याग कर ईश्वर प्राप्ति ही अपना जीवन लक्ष्य बना चुके हों उनके स्नान को शाही स्नान क्यों कहा जाता है? मुझे समझ नहीं आता। दूसरा, सबसे पवित्र महूर्त को क्यों संतो के स्नान के लिए आरक्षित किया गया है? यह भी मेरी मोटी बुद्धि को समझ नहीं आता। आम धार्मिक गृहस्थ तो संतो की तरह कठिन तप कर मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता इसलिए शायद उसे मोक्ष प्राप्ति के लिए सबसे पवित्र महूर्त में स्नान करने की अधिक आवश्यकता होती है।जबकि संत तो मोक्ष प्राप्त कर चुके होते हैं। उनके तो स्पर्श मात्र से ही हर जल पवित्र हो जाता है। कहने का मतलब है कि आदि काल से ही हमारी पूरी व्यवस्था असमानता व खास के लिए खास सुविधा आरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है। मायावती क्या कर रही है केवल इतना ही कि इस व्यवस्था की चादर को अपने सिर पर भी तान रही है। जब ऊपरी जमात यह करती है तो हमें कोई परेशानी नहीं होती परंतु जब सदियों से दलित बनाए गए लोग करते हैं तो हमें मिर्ची लगती है। हमें गरीब गुरबे याद आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे धार्मिक संस्थानों में धन का जब प्रदर्शन होता है तब भी हमें गरीब याद नहीं आते। मुंबई में गणेश उत्सव के बाद हर साल चढ़ावे की खबरें मीडिया में चटकारे ले ले कर बताई जाती हैं। बहुमूल्य रत्न जड़ित आभूषणों के फोटो दिखाए जाते हैं। या अक्सर धनी लोगों द्वारा रत्न जड़ित मुकुट या कुर्सी का चढ़ावा या करोड़ों बड़े बड़े मंदिरों में चढ़ावा मीडिया में खबर बनता है। पर कहीं यह प्रश्न नहीं उठती कि भारत जैसे गरीब देश में इस पूँजी को गरीबी, कुपोषण दूर करने के लिए क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए? यह उस धर्म के अनुयाइयों का हाल है जिस धर्म में जीव मात्र में भगवान के दर्शन होते हैं। पर हम जीव मात्र की पूजा करने के बजाय धन की पूजा करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मायावती ने लखनऊ नौएडा में पार्क बनाए मूर्तियाँ लगाई तो उत्तर प्रदेश के गरीब व पिछड़े, समाज के सभी प्रबुद्ध जनों को याद आए। लेकिन मुलायम सिंह जब मुख्यमंत्री थे तब सैफई में क्या कर रहे थे? या अन्य दलों के नेता अपने प्रतीकों पर कितना सार्वजनिक धन संपत्ति बरबाद करते हैं? क्या गरीब या गरीबी केवल उत्तर प्रदेश में है। महाराष्ट्र में कांग्रेस, बीजेपी शिव सेना क्या प्रतीकों की राजनीति नही करते क्या वहाँ गरीब नहीं है।(14वीं लोक साभा व महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव से ऐन पहले महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई में जो शिवाजी की विशालकाय मूर्ति लगाने की घोषणा की थी उस समय महाराष्ट्र के गरीबों या मुंबई के गरीबों की याद किसी ने सरकार को नहीं दिलाई।) दिल्ली में राष्ट्रीय नेताओं के स्मारक बनाने में जो संसाधन लगाए गए यदि उन संसाधनों का उपयोग में हाशिये पर रह रहे लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए किया जाता तो क्या वह उन नेताओं को सच्ची श्रद्धांजलि नहीं होती? दिल्ली में रह रहे अधिकतर लोगों के पास भी जीवन की मूल सुविधाएँ नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिविल सोसाइटी भी गरीबों को हाशिए में रखने में विश्वास करती है। पिछली शताब्दी के नब्बे के दशक में भारत के लगभग सभी बड़े शहरों में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर उद्योगों को बंद कर दिया गया। लाखों मजदूर बेरोजगार होगए। इसी बहाने गरीबों की झुग्गियाँ तोड़ी जाती हैं। सिविल सोसाइटी ने पर्यावरण के नाम पर इस कदम को सराहा। परंतु जब धार्मिक उत्सवों के बाद मूर्ति व पूजा सामग्री विसर्जन से नदियों, तालावों व समुद्र का पानी प्रदूषित होता है। फटाकों से ध्वनि प्रदूषण होता है। वायु प्रदूषण होता है। सिविल सोसाइटी आँख मूँद लेती है। मीडीया में हर साल पिछले साल से बड़ी मूर्तियाँ या सबसे बड़ी मूर्ति लगाने का दावा धार्मिक संस्थाएँ करती हैं। श्रद्धा में डूबे लोगों से पर्यावरण प्रदूषण के बारे में कोई नहीं पूछता। यहाँ पर भी खास लोगों के लिए खास सुविधाएं वाला सिद्धांत ही लागू होता है। बूढ़े़, बीमार व अशक्त पर इस पर्यावरण प्रदूषण का असर सर्वाधिक पड़ता है। बूढ़े़, बीमार व अशक्त भी तो एक तरह से हाशिये के लोग ही तो हैं। गरीबों में इनकी तादाद अधिक होती है। हम मानव कल्याण की बात तो करते हैं पर काम नहीं। हमें भी गरीब को तभी याद करते हैं जब मायावती व अन्य दलित धन प्रदर्शन करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं मायावती का समर्थन या बचाव नहीं कर रही हूँ। गलत काम गलत है चाहे गलती कोई भी करे। परंतु यदि गल्ती करना हमारी आदत बन गई हो और इसको सामाजिक मान्यता मिल गई हो तो मामला गंभीर हो जाता है। हमें समरथ को नहीं दोष गोसाईं वाली मानसिकता को समाप्त करना होगा। मायावती से पहले सदियों से चले आ रहे समाज के उन कर्णधारों को खास से आम बनना होगा जिनको मायावती के खास बनने पर आम जन की याद आती है। ऐसा किये बगैर मायावती की आलोचना करना महज अपने मनुवादी दुराग्रहों को अभिव्यक्ति देना ही होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Blogvani Link --&gt;&lt;a href='http://www.blogvani.com/trans/eng/?url=http://lokmitr.blogspot.com/'&gt;&lt;img src='http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg' alt='www.blogvani.com' style='border:0'/&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-- Blogvani Link Ends --&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1713771972607997617-2638082789502568904?l=lokmitr.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lokmitr.blogspot.com/feeds/2638082789502568904/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1713771972607997617&amp;postID=2638082789502568904&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1713771972607997617/posts/default/2638082789502568904'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1713771972607997617/posts/default/2638082789502568904'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lokmitr.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='मायावती ही शिकार क्यों?'/><author><name>वेद प्रकाश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13067846901937499742</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCSwp1kYnLQ/R7pXzEJLAEI/AAAAAAAAAAY/JZYuaNR5tzE/S220/DSC00584.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1713771972607997617.post-3663782338688668482</id><published>2010-02-17T00:02:00.000+05:30</published><updated>2010-02-17T00:02:04.303+05:30</updated><title type='text'>डॉ. धर्मवीर की 'प्रेमचंद- सामंत का मुंशी'</title><content type='html'>डॉ. धर्मवीर की पुस्तक ‘प्रेमचंद: सामंत का मुंशी’ उनकी ‘मातृसत्ता, पितृसत्ता और जारसत्ता’ पर पुस्तक शृंखला की तीसरी पुस्तक है. पुस्तक का नाम देखकर ऐसा लगता है कि इसमें शायद प्रेमचंद के कथा साहित्य की एक नई दृष्टि से व्याख्या होगी. परंतु ऐसा है नहीं. इस किताब का प्रेमचंद के साहित्य से कुछ खास लेना देना नहीं है. वह तो यों ही बीच बीच में छिटपुट आ जाता है. डॉ. धर्मवीर प्रेमचंद की कहानी ‘कफ़न’ का जिक्र करते हुए घीसू और माधव के अमानवीय व्यवहार को उनका विद्रोह बताते हुए कहते हैं— ‘सारी कहानी नए सिरे से स्पष्ट हो जाती यदि प्रेमचंद इस कहानी की आखरी लाइन में दलित जीवन का यह सच लिख देते कि बुधिया गाँव के जमीदार के लोंडे से गर्भवती थी. उसने बुधिया से खेत में बलात्कार किया था. तब, शब्द दीपक की तरह जल उठते और सब कुछ समझ में आ जाता. अपेक्षा ज्यादा की थी लेकिन घीसू और माधव इतना ही विद्रोह कर सके थे कि जमींदार के बच्चे को अपना बच्चा नहीं कहेंगे. यह असली पीड़ा है. दलित का असली शोषण यह है कि कई बार उसकी कथित औलाद उसकी असल औलाद नहीं है. इस शोषण के सामने आर्थिक शोषण कितना छोटा पड़ जाता है!’ (पृ.17) वे आगे कहते हैं—‘क्या बेहतर है—बुधिया और बुधिया के बच्चे को मरने देना—या दूसरों की औलाद को अपनी कह कर पालना.’ (पृ.29) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि प्रेमचंद अपनी कहानी ‘कफन’ में घीसू और माधव के अमानवीय चरित्र का कारण बताते हुए लिखते हैं—‘जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज्यादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी.’ (पृ.19)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इससे डॉ. धर्मवीर को क्या? प्रेमचंद का उनका मूल्यांकन प्रेमचंद की दूसरी पत्नी शिवरानी देवी के संस्मरण- ‘प्रेमचंद: घर में’ में दी गई एक घटना पर आधारित है. जिसमें प्रेमचंद कहते हैं- ‘अच्छा एक और चोरी सुनो. मैंने अपनी पहली स्त्री के जीवन-काल में ही एक और स्त्री रख छोड़ी थी. तुम्हारे आने पर भी उससे मेरा संबंध था.’(पृ.24) उनके अनुसार—‘यह हुआ प्रेमचंद के पारिवारिक जीवन का हिसाब-किताब—दो पत्नियाँ और एक रखैल और बाकी...? यह शरण कुमार लिंबाले जैसे दलित लेखकों की जन्मकुंडली है. वे ऐसे ही पैदा होते हैं.’ (पृ.29) और  ‘यदि इन दो ब्याहताओं के अलावा उस तीसरी औरत के पेट से प्रेमचंद का बच्चा जन्मा हो तो वह औरत अपने ससुर और पति के लिए घीसू और माधव की बुधिया बन कर रह जाती है.’(पृ.26) डॉ. धर्मवीर आगे कहते हैं- ‘बताइए, हिंदी के इस महान कहे जाने वाले लेखक ने ताउम्र चोरी की! सेक्स का चोर साहित्य लिख रहा है.’ (पृ.27) और ‘यदि वह तीसरी औरत उनकी रखैल थी तो उसका भरण-पोषण भी किया होगा. तब हो गया न डबल खर्चा. फिर हो गए न जमींदार सिद्ध. फिर किसी लेखक की गरीबी के रोने कैसे?’ (पृ.26-27) और ‘मैं उन्हें साहित्यिक जमींदार कहना चाहता हूँ. साहित्यिक जमींदार ही रखैल रख सकते थे जो उन्होंने सच में रख रखी थी.’ (पृ.43-44)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन प्रेमचंद ही क्यों पूरा हिंदू समाज और उसका कानून ही इस जारकर्म के लिए दोषी है. वे कहते हैं—‘उनका (प्रेमचंद) हिंदू कानून एक बुरा कानून था, इसीलिए प्रेमचंद रखैल रखने की जुर्रत कर सके. उनके हिंदू कानून में हर पति जमींदार और सामंत होता है.’ (पृ.28) उनके अनुसार—‘किसी भी हिंदू पुरुष या हिंदू स्त्री को विवाह या पुनर्विवाह के शब्दों का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है. इन्हें विवाह या पुनर्विवाह के कायदे-क़ानूनों का क्या पता जब उस दौरान इनके लिए जारकर्म कानूनी रूप में अनुमत रहता है. इसलिए हिंदुओं के विवाह को विवाह न कह कर विवाह+जारकर्म कहा जाए तो सच्चाई के ज्यादा नजदीक जाया जा सकता है.’ (पृ. 26) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पुस्तक में प्रेमचंद के मूल्यांकन का आधार उनका साहित्य न हो कर उनका चरित्र है. वे कहते हैं—‘भारत के जातीय वातावरण में किसी लेखक की जाति जानने से उसके साहित्य को समझने में काफी मदद मिलती है.’ (पृ.13) उन्हें बुधिया की पीड़ा से ज्यादा चिंता प्रेमचंद की तीसरी औरत को खोजने की है और इस यज्ञ में वे सभी को शामिल करवाना चाहते हैं—‘प्रेमचंद  के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पीएचडी की उपाधि के लिए सैंकड़ों शोध कार्य हो चुके हैं,--क्या उनमें से किसी ने इस बाबत खोज की है?’ (पृ.30)  यानी डॉ. धर्मवीर कह रहे हैं कि किसी व्यक्ति के साहित्य का मूल्यांकन उसके साहित्य के आधार पर न करके उसके व्यक्तिगत चरित्र के आधार पर किया जाए. इसका मतलब हुआ कि कोई किताब पढ़ने से पहले हमें लेखक की जाति और निजी जीवन की जाँच करानी चाहिए. यदि जाँच रिपोर्ट हमारे मन माफिक हो तभी उस किताब को पढ़ना चाहिए.&lt;br /&gt;डॉ. धर्मवीर ने अपना पूरा तर्क इस एक बात पर खड़ा किया है. और यहाँ से वे अपनी ‘महान’ खोज जार कर्म की ओर जाते हैं. दलितों की स्थिति का बखान करते हुए डॉ. धर्मवीर कहते हैं—‘दलित की मुसीबतों का एक पूरा दलित शास्त्र हुआ करता है. यह दलित शास्त्र क्या है और किस हद तक लागू होता है? मोटे रूप में यह शास्त्र दो चीजों से बना है. ...पहला, दलित पुरुषों के साथ अस्पृश्यता और दलित नारियों के साथ बलात्कार और जारकर्म—ये इसके दो बड़े विभाजन हैं. ये किस हद तक लागू होते हैं? ये दोनों शत-प्रतिशत लागू होते हैं क्योंकि ये जातीय आधार पर हैं, व्यक्तिगत आधार पर नहीं.’ (पृ.19) दरअसल इस पुस्तक का विषय प्रेमचंद का साहित्य न हो कर जारसत्ता है. दिलचस्प बात यह है कि डॉ. धर्मवीर पूरी पुस्तक में जारसत्ता के उदाहरण तो पेश कर रहे हैं पर वे इनके मूल कारणों की पड़ताल नहीं कर रहे हैं. उनके उदाहरण तिलमिला देने वाली भाषा में अपने विरोधियों का मजाक उड़ाने वाले हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. धर्मवीर सवर्णों के बारे में अपने पावन विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं—‘द्विज के सामने मोरल की बात कही जाएगी तो वह घर छोड़कर संन्यासी तो बन सकता है लेकिन पारिवारिक और वैवाहिक जीवन में सदाचारी नहीं बनेगा. उसके संस्कार की कुछ बुनावट ही ऐसी है कि वह गृहस्थ जीवन में रखैल, वेश्या और परस्त्री के साथ के जारकर्म से रुक नहीं रहा है. इसे कौन समझाए,--नहीं, इसके प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों को कौन समझाए.’ (पृ.30)  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो उन्हें स्त्री मात्र से चिड़ है, जो इनके पुराने लेखन से और इसी शृंखला की दूसरी पुस्तक के ‘तीन हिंदू स्त्री लिंगों का चिंतन’ के नाम तक से जाहिर होती है, पर दलित लेखिकाओं से उन्हें खास आपत्ति है. वे कहते हैं--‘मुझे और भी बुरा लगता है जब कोई दलित नारी गैर-दलित पुरुष का बचाव करती है, अब वह अनिता भारती हों या कोई और. अनिता भारती प्रेमचंद के रूप में एक जार पुरुष की प्रशंसा कर रही हैं.’(पृ.51)  और ये ‘दलित महिला के यौन-शोषण को कितने हल्के ढंग ले रही हैं. बस, इनकी तरफ से यही कहने की कमी रह गई है कि द्विज लोग दलित स्त्रियों का शोषण नहीं करते हैं बल्कि उन पर उपकार करके और उन्हें गर्भवती करके उन्हें संतान देते हैं. क्या अनिता भारती बुधिया बनना चाह रही हैं. मुझे नहीं लगता कि उस बेचारी का कोई दोष था लेकिन अनिता भारती की सोच में निश्चित रूप से भारी खोट है. जब स्त्री का यौन शोषण हो गया तो घर लुट गया. तब चमारी के गर्भ से जमीदार की औलाद पलेगी. फिर, क्या न्यूनतम मजदूरी का सवाल और किसके बच्चों के लिए शिक्षा? तब क्या नारी के अधिकार बनते हैं जब पुरुष के पास देने को ही कुछ नहीं बचा है?’(पृ.66) डॉ. धर्मवीर के मुताबिक दलित समस्या की जड़ गरीबी या असमानता नहीं बल्कि दलित औरत का यौनाचार है—‘मामला गरीबी तक सीमित नहीं है, --मामला गरीबी का बिलकुल नहीं है—बल्कि दलित औरतों के यौनाचार की गुलामी का है.’(पृ.16)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठकगण, आप भी जानें कि अनिता भारती ने ऐसा क्या लिख दिया जिससे डॉ. धर्मवीर को उनकी सोच में भारी खोट दीख रहा है—‘सवाल उठता है कि दलित साहित्यकार स्त्री के यौन शोषण या बलात्कार से, सवर्णों के उन पर आधिपत्य से इतने आतंकित क्यों हैं? क्यों बार-बार लेखन का विषय दलित स्त्री का शोषण बनता है. जबकि दलित लेखिकाओं का कलेवर अत्यंत विस्तृत है. वह दलित स्त्री के अस्तित्व से ले कर, न्यूनतम मजदूरी, शिक्षा, उनके अपने समाज द्वारा हड़पे गए अधिकारों तक को उन्होंने अपने साहित्य का विषय बनाया है. दलित स्त्री की केवल और केवल समस्या यौन शोषण ही तो नहीं है.’(पृ.65-66)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कहें तो मामला दलित स्त्रियों या हिंदुओं के जारकर्म का नहीं, भारत के प्रगतिशील विचारकों और चिंतकों को घेरने का, उनकी छवि धूमिल करने का है. नहीं तो लेना एक न देना दो, नेहरू जी को लपेटने का क्या बढ़िया तर्क दिया है—‘पंडित जवाहर लाल नेहरू नाम के ब्राह्मण को मुफ्त में प्रगतिशील होने का खिताब दिलवा देती है जबकि नेहरू एक ब्राह्मण होने के नाते हिंदू कोड बिल के मामले में पूरे पिछड़े हुए आदमी थे.’ (पृ.15)  वे पहले भी हजारी प्रसाद द्विवेदी, मैनेजर पाण्डेय, पुरुषोत्तम अग्रवाल आदि प्रगतिशीलों की खबर ले चुके हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे अपनी कृपादृष्टि दलित स्त्रियों या सवर्ण प्रगतिशीलों पर ही नहीं भगवान बुद्ध पर भी डालते हैं—‘ प्राचीन भारत में बुद्धं शरणं गच्छामि करने वाले उन बौद्ध भिक्षुओं की इतनी लंबी कतार क्या थी? अध्यात्म की खोज और प्राप्ति की बात होती तो दो-चार लोग घऱ-बार छोड़ कर भिक्षु, अर्हत या संन्यासी बन जाते. इतने सारे लोग अपने घरों को छोड़कर आध्यात्मिक क्यों बन गए हैं? ध्यान रहे, संन्यासियों ने घर-बार ही नहीं छोड़ा है, बल्कि समाज और राष्ट्र भी छोड़ा है. संन्यास का दूसरा नाम सामाजिक मृत्यु है. ऐसे कानून से व्यक्ति के लिए संन्यास से ही जिन्दा रहने का एकमात्र रास्ता निकलता है. लेकिन उसमें राष्ट्र लुट जाता है—तब वह विदेशियों के हाथों में चला जाता है.’ (पृ.48) यानी कि भारत की मुसलमानों के आगे हार में बौद्धों का प्रभाव था तो भइया ईसाइयों के समय हार में कौन-सा बौद्ध धर्म आड़े आया, जरा ये भी बता देते तो बहुत अच्छा होता. पाठको, सच्चाई तो ये है कि भारत की हार का मुख्य कारण इसका जातियों और छोटे-छोटे रजवाड़ों में बँटा होना था. लेकिन यहीं तक इति नहीं है डॉ. धर्मवीर की पावन दृष्टि से डॉ. अंबेडकर भी बच नहीं पाए हैं-- ‘यदि बाबा साहेब के पास उस समय भारत के तमाम दलित संतों का साहित्य उपलब्ध होता तो वे बुद्ध की शरण में जाने के बजाय अपने संतों के ढिग बैठते.’ जब डॉ. अंबेडकर को नहीं बख्शा तो बेचारे प्रेमचंद की क्या बिसात. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरुण शौरी की इतिहासकारों पर एक किताब है—‘एमिनेंट हिस्टोरियन्स: देअर टेक्नोलॉजी, देअर लाइन, देअर फ्राड’. इस किताब में उसने सभी महत्त्वपूर्ण साम्यवादी इतिहासकारों की कटु आलोचना की है. पाठकगण, उनकी इतिहास संबंधी अवधारणाओं की नहीं, उनके टीए-डीए बिलों और अनुदानों के हेर-फेर की. ये बातें भी कितनी तथ्य आधारित है ये तो विभाग की गोपनीय फाइलें ही बता पाएँगी. कमोबेश यही पद्धति अरुण शौरी ने डॉ. अंबेडकर पर लिखी अपनी किताब ‘वर्शिपिंग फाल्स गॉड्स’ में अपनाई है. और ठीक यही पद्धति डॉ. धर्मवीर ने इस पुस्तक में प्रेमचंद पर अपनाई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए, इसके बरक्स जरा ये भी जानें कि डॉ. अंबेडकर जार कर्म पर क्या कहते हैं. अपनी पुस्तक ‘बुद्ध या कार्लमार्क्स’ (सेवास्तंब एवं संजीवैय्या इंस्टीट्यूट ऑफ सोशियो इकनोमिक स्टडीज़, दिल्ली द्वारा प्रकाशित, पृ.35) में बुद्ध को उद्धृत करते हुए कहते हैं—‘(15) और बंधुओं, इसलिए, दीन-हीनों, दरिद्रों को वस्तुएँ व माल न दिए जाने से निर्धनता फैली, उसका विस्तार हुआ, चोरी, हिंसा, हत्या, झूठ, बुराई करना आदि जैसी बातें प्रचुर मात्रा में बढ़ गई. (16) झूठ बोलने से जार कर्म में वृद्धि हुई. (17) इस प्रकार दीन-हीनों, दरिद्रों को माल व वस्तुएँ न दिए जाने के कारण निर्धनता... ए चोरी... हिंसा... झूठ... चुगलखोरी... अनैतिकता फैली, उसका विस्तार हुआ. (18) बंधुओं उनके बीच तीन चीजों की वृद्धि हुई. ये थीं, कौटुंबिक व्यभिचार, अनियंत्रित लालच तथा विकृत लोभ’.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी कि भगवान बुद्ध और डॉ. अंबेडकर के अनुसार व्यभिचार या जार कर्म का कारण आर्थिक असमानता और उससे उपजी निर्धनता है. यही बात कार्ल मार्क्स ने  ‘अर्थशास्त्र और दर्शन संबंधी 1844 की पांडुलिपियाँ’, (इंडिया पब्लिशर्स, लखनऊ, 1981, पृ. 38-39)  में फ्रांसीसी दार्शनिक व समाजशास्त्री पेक्वेअर कांसतेंतिन को उद्धृत करते हुए कहा है—‘इस  तरह की आर्थिक व्यवस्था मनुष्यों को ऐसे अधम पेशों में काम करने के लिए मजबूर करती है. ऐसी भयानक और कटुतापूर्ण अधोगति की ज़िंदगी जीने के लिए विवश करती है कि इसकी तुलना में, बर्बर मनुष्य का जीवन भी राजकीय ठाटबाट वाला प्रतीत होता है. संपत्ति-विहीन वर्ग के साथ सभी रूपों में व्यभिचार किया जाता है.’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संक्षेप में, जहाँ मार्क्स और अंबेडकर व्यभिचार या जारकर्म के लिए निर्धनता और असमानता को दोषी ठहराते हैं तथा वहीं डॉ. धर्मवीर उच्च जातियों की हिंदू मानसिकता को इसका दोष देते हैं. दरअसल उनकी दिक्कत यह है कि उन्होंने अपने शत्रु तय कर लिए हैं. उनके वैचारिक संहार के लिए वे तर्कों के हथियार लेकर घूम रहे हैं, चारों ओर कत्लेआम मचाते हुए. यही कारण है कि दलित स्त्रियों का यौन शुचिता के अलावा दूसरे मुद्दों पर बात करना इन्हें नागवार गुजरता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस व्यक्तिगत नैतिकता पर डॉ. धर्मवीर और अन्य फासीवादी इतना ज़ोर देते हैं, उस पर जर्मन कवि बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की एक कविता याद आती है—&lt;br /&gt;मैंने सुना है, प्रधान मंत्री पीता नहीं है&lt;br /&gt;वह नहीं खाता मांस और नहीं करता धूम्रपान&lt;br /&gt;और वह रहता है एक छोटी सी कोठी में.&lt;br /&gt;पर मैंने यह भी सुना है, ग़रीब&lt;br /&gt;भूखों मर रहे और गल रहे कंगाली में.&lt;br /&gt;क्या ही बेहतर होता राज्य वह, जहाँ यह कहा जाता:&lt;br /&gt;प्रधान मंत्री धुत्त बैठता है कैबिनेट की बैठकों में,&lt;br /&gt;अपने पाइपों से निकलते धुएँ को घूरते, कानून बदलते हैं&lt;br /&gt;कुछेक अनपढ़ बैठे-बैठे.&lt;br /&gt;ग़रीब नहीं हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व का सार्वजनिक आचरण और मूल्यबोध ही महत्त्वपूर्ण होता है. क्योंकि वही समाज को प्रभावित करता है. अक्सर निजी जीवन में व्यक्तिगत नैतिकता को अतिरेक की हद तक महत्व देने वाले लोग सार्वजनिक जीवन में बेहद क्रूर होते हैं या क्रूर और अमानवीय नीतियों का मौन/मुखर समर्थन करते पाए जाते हैं. जैसे औरेंगजेब और अडवाणी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालाँकि डॉ. धर्मवीर इसे भी अनैतिकता के समर्थन में मान सकते हैं. पर इसका किया ही क्या जा सकता है. उनकी दृष्टि से देखें तो कई सवालों पर उनकी राय आना अभी बाकी है. जिन दलित स्त्रियों ने सवर्ण पुरुषों से विवाह किया वे तो उनके अनुसार बलातकृता और रखैल हैं तो जिन दलित पुरुषों ने सवर्ण स्त्रियों से विवाह किया उन सवर्ण स्त्रियों को वे क्या मानते हैं और उन दलित पुरुषों के बारे में उनका क्या नज़रिया है. और जिन दलित पुरुषों ने अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति मजबूत होने के चलते दलित या सवर्ण स्त्रियों से जार कर्म किया है, उन पर उनकी राय क्या है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल डॉ. धर्मवीर की समझ सिर के बल खड़ी है. वे हिंदू धर्म के ब्राह्म विवाह को कारण और जार कर्म को उसका परिणाम मान रहे हैं. इसीलिए वे हिंदू कोड बिल के सख्ती से लागू किए जाने को सारी समस्याओं का हल मान रहे हैं. जबकि वास्तविकता यह  है कि दलितों का यौन शोषण उनकी आर्थिक-समाजिक स्थितियों के कारण होता है, हिंदू धर्म के मनुस्मृति सरीखे ग्रंथ इसके कारण नहीं, केवल स्थिति को रेखांकित करने वाले हैं. इनका विरोध– ढोर, गंवार, सूद्र, पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी—जैसी इक्का दुक्का टिप्पणियों के आधार पर न करके, उनकी मूल असमानता वादी दृष्टि के आधार पर करना चाहिए. इसीलिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष श्री सूरजभान की यह माँग की कि हिंदुओं को अपने धर्म ग्रंथों से ऐसी टिप्पणियों को निकाल देना चाहिए. हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को रास आती है, दलितों को नहीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जातिवाद की समस्या का हल बताते हुए डॉ. अंबेडकर कहते हैं—‘समाज का लक्ष्य एक नवीन नींव डालने का होना चाहिए, जिसे फ्रांसीसी क्रांति द्वारा संक्षेप में तीन शब्दों में—समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा—कहा गया है.’ (बुद्ध या कार्ल मार्क्स, पृ.40) इतना ही नहीं, ‘डॉ. अंबेडकर जाति व्यवस्था का प्रतिपक्ष सामाजिक जनतंत्र—सोशल डेमोक्रेसी को मानते थे. राजनैतिक जनतंत्र और सामाजिक जनतंत्र के बीच बिल्कुल ठीक फर्क करते हुए वे राजनीतिक जनतंत्र को सामाजिक जनतंत्र को स्थापित करने का साधन मानते थे.’ (पुरुषोत्तम अग्रवाल, अकबर नाम लेता है खुदा का... , तद्भव, अप्रैल 2003, पृ.54) इसीलिए डॉ. अंबेडकर ने इस देश में अपने संविधान के द्वारा राजनैतिक जनतंत्र स्थापित किया और सामाजिक जनतंत्र का रास्ता खोला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. अंबेडकर अपने प्रसिद्ध भाषण – जातिभेद का उच्छेद – में जातिवाद को तोड़ने का सबसे ताकतवर हथियार अंतर्जातीय विवाह को मानते हैं. और डॉ. धर्मवीर को दलित महिलाओं का अंतर्जातीय विवाह की बात करना दलित कौमों का मजाक उड़ाना लगता है—‘तब अनिता भारती क्या कह रही हैं? दलित कौमें हारी हुई हैं—और इसका सबसे खतरनाक अर्थ यह है कि उनकी औरतें उनकी नहीं हैं. इसलिए, जब कोई दलित नारी जात तोड़ने की बात कहती है तो लगता है मानों वह दलित कौमों की ज्यादा मजाक उड़ा रही है क्योंकि तब गैर दलितों द्वारा उड़ाई मजाक कम पड़ती है.’ (पृ.53)  इतना ही नहीं वे सामाजिक शिष्टाचार का उल्लंघन करते हुए व्यक्तिगत टिप्पणी करते हैं—‘अनिता भारती दलित पुरुषों से अलग से क्या चाहती हैं? दलित स्त्रियों को रखैल, वेश्या और देवदासी बना कर यौन मामलों में उनकी जात पूरी तरह तोड़ दी गई है. इसलिए, ऐसी सोच की स्त्री यदि अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहती है तो गैर-दलितों से लड़े. रखैल के रूप में अधिकार माँगे, वेश्या के रूप में दाम बढ़वाए और देवदासी के रूप में पुजारी की संपत्ति में हाथ मारे—यहाँ दलित पुरुष के पास क्या रखा हैं? जब दलित की पत्नी जमीदार के रह रही हो और जमीदार से अपने बच्चे पैदा कर रही हो तो दलित पति से मिलने वाले उसके कौन से अधिकार सृजित होते हैं? तब जो भी उसके अधिकार बनते हैं वे जमीदार की तरफ से बनते हैं. तो वहाँ लड़े, यहाँ क्या कर रही है?’ (पृ.67) डॉ. धर्मवीर दलित साहित्यकारों को रास्ता दिखा रहे हैं कि वे क्या लिखें--‘दलित साहित्य उसे ही कहा जाएगा जिसमें पारिवारिक जीवन में तलाक की अनुमति हो, स्त्री के लिए भरण-पोषण पर रोक लगे तथा जारकर्मी को जारकर्म की जिम्मेदारी से नवाजा जाए.’ (पृ.53). &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दलित लेखकों और चिंतकों के सामने डॉ. अंबेडकर का अधूरा कार्य पड़ा है. सामाजिक जनतंत्र और आर्थिक समानता की स्थापना का. डॉ. अंबेडकर एक पुस्तक लिख रहे थे—क्रांति और प्रतिक्रांति की संकल्पना पर. आज प्रतिक्रांति की ताकतें प्रबल हैं. यह फैसला दलित लेखकों और चिंतकों को करना है कि वे किस तरफ हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Blogvani Link --&gt;&lt;a href='http://www.blogvani.com/trans/eng/?url=http://lokmitr.blogspot.com/'&gt;&lt;img src='http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg' alt='www.blogvani.com' style='border:0'/&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-- Blogvani Link Ends --&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1713771972607997617-3663782338688668482?l=lokmitr.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lokmitr.blogspot.com/feeds/3663782338688668482/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1713771972607997617&amp;postID=3663782338688668482&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1713771972607997617/posts/default/3663782338688668482'/><link 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सिद्धांत से वे बहुत ही भयभीत हो जाते हैं. लेकिन वही लोग यह भूल जाते हैं कि भारत न केवल वर्ग-संघर्ष, बल्कि वर्ग युद्ध की भूमि भी बन चुका है.’&lt;br /&gt;—डॉ. अंबेडकर, ‘हिंदुत्व का दर्शन’ से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुराने ज़माने से ही भारत के लोगों ने यहाँ के शासक वर्ग का विरोध किया है, शासक वर्ग की विचारधारा का विरोध किया है. शासक वर्ग की विचारधारा का स्रोत वैदिक साहित्य है. वैदिक साहित्य को तीन भागों में बाँटा जाता है—संहिता, ब्राह्मण और उपनिषद. संहिताएँ चार हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद. वैदिक साहित्य का कर्मकांडीय पक्ष ब्राह्मणग्रंथ हैं. ब्राह्मण ग्रंथों में मुख्य हैं—ऐतरेय, शांखायन, शतपथ, तवल्कार और गो-पथ. वैदिक साहित्य का विचारधारा या चिंतन पक्ष उपनिषदों में आता है. उपनिषदों में मुख्य हैं—ऐतरेय, छांदोग्य, केन, कठ, ईश, प्रश्न और मांडूक्य. इन ब्राह्मणग्रंथों ने भारतीय समाज में जो कर्मकांड का जाल फैलाया उसने असमानता और अशिक्षा को बढ़ावा दिया, ब्राह्मण वर्ग को विशेषाधिकारों का मालिक बनाया. और उपनिषदों ने इन ब्राह्मणग्रंथों द्वारा ब्राह्मणों को दिए विशेषाधिकारों पर छद्म मानवता का मुलम्मा चढ़ाया. छद्म मानवता इसलिए कि इसमें मानवतावादी शब्दावली में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का ही डंका बजाया गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही ब्राह्मणवाद यहाँ के शासक वर्ग की विचारधारा रही है. यह विचारधारा असमानता और ब्राह्मण वर्ग के विशेषाधिकारों की समर्थक रही है. यहाँ के शासक वर्ग की अपनी भाषा (संस्कृत) तक रही है. जो यहाँ के संसाधनों के शोषण का जरिया रही है. यहाँ के शासक वर्ग की विचारधारा ब्राह्मणवाद यानी ब्राह्मण वर्ग की श्रेष्ठता का गुणगान, उसकी समाजव्यवस्था यानी वर्णाश्रम व्यवस्था और जातिवाद, उसकी शोषण और लूट की तिकड़में यानी यज्ञ और उसकी भाषा यानी संस्कृत—यही सब मिलकर बनाते हैं भारतीय शासकवर्ग के लूटतंत्र का ढाँचा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इन्हीं चारों चीज़ों को सबसे पहले और सबसे ताकतवर ढंग से चुनौती दी थी—भगवान बुद्ध ने. भगवान बुद्ध ने लूट की तिकड़म -यज्ञों- का सबसे जबर्दस्त विरोध किया, ब्राह्मण भाषा ‘संस्कृत’ के स्थान पर लोकभाषा पालि को अपनाया. वैदिक विचारधारा की छद्म मानवता के शब्दजाल को काट दिया और समानता का दीपक जलाया. समाज में विज्ञान के विकास को प्रोत्साहन दिया. उनके संघों में चिकित्साशास्त्र और दूसरे ज्ञान-विज्ञानों को आश्रय मिलता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरी दुनिया का स्वतंत्र चिंतन का सबसे पहला महान घोषणा पत्र (मैग्ना कार्टा) सुमत्ति सुत्त है. इसमें भगवान बुद्ध कहते हैं—हे कालामो! आओ, तुम किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार मत करो कि यह अनुश्रुत है, केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि यह बात परंपरागत ... है, केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि यह हमारे धर्मग्रंथ के अनुकूल है, केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि यह तर्कसम्मत है, केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि यह अनुमान-सम्मत है, केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि इसके कारणों की सावधानीपूर्वक परीक्षा कर ली गई है, केवल इसलिए स्वीकार मत करो कि कहने वाले का व्यक्तित्व भव्य है, केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि कहने वाला श्रमण हमारा पूज्य है. हे कालामो! जब तुम स्वानुभव से अपने आप ही यह जानो कि ये बातें अकुशल हैं, ये बातें सदोष हैं, ये बातें विज्ञ पुरुषों द्वारा निंदित हैं, इन बातों पर चलने से अहित होता है, दुःख होता है – तब हे कालामो! तुम उन बातों को छोड़ दो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान बुद्ध के साथ-साथ चार्वाकों, जैनियों, सिद्धों, नाथों आदि ने भी ब्राह्मणवादी विचारधारा के विभिन्न पक्षों का विरोध किया. जनसाधारण के पक्ष में लोकतांत्रिक चेतना के विस्तार और प्रसार में इन समुदायों की अहम भूमिका रही है. इसके बाद एक प्रबल जनपक्षधर आंदोलन का दौर चला जिसकी शुरुआत रैदास और कबीर से हुई. इस निर्गुण भक्तिधारा ने मध्यकाल में कारीगर जातियों के उत्थान और समृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ब्राह्मणवादी और जातिवादी चेतना पर इनके हमले बेहद तीखे थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद अंग्रेजों का शासन आया. अंग्रेजों को सेना के लिए सिपाही चाहिए थे. उन्होंने अछूतों को सेना में भरती किया जिससे दलितों और पिछड़े वर्गों में शिक्षा का प्रसार होना शुरू हुआ. इसी समय में एक और महापुरुष हुए ‘महात्मा जोतिबा फुले’, जिन्होंने शूद्रों और अछूतों में शिक्षा के प्रचार और प्रसार को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया. उन्होंने ब्राह्मणवादी शोषण को बेनकाब करने के लिए कई नाटक लिखे, लेख और पुस्तकें लिखीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सारे प्रयासों को समेटते हुए, ज्ञान, समता, मानव अधिकार और स्वतंत्रता के सभी पक्षों का पूर्ण विकास करते हुए एक महामानव हमारे बीच आए—बाबा साहेब डॉ. भीम राव अंबेडकर. वे बहुमुखी प्रतिभाशाली, उच्च कोटि के विद्वान, महान स्वतंत्रता सेनानी और दलित वर्गों के मुक्तिदाता थे. हजारों साल के ज्ञान को निचोड़कर उन्होंने मानव समता का रास्ता सामने रखा. समाज, धर्म, अर्थ, राजनीति, मानवता, स्वतंत्रता, समानता सभी पक्षों पर उन्होंने महान ग्रंथ रचे. और इस देश के बहुसंख्यक पिछड़े, दलित वर्गों के लोगों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों  को मुक्ति का रास्ता दिखाया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके भाषणों, लेखों और पुस्तकों से सारे देश के दलित वर्गों में उत्साह का संचार हो गया. अपनी बात को लोगों के बीच ले जाने के लिए उन्होंने समाचारपत्र प्रकाशित किए. सबसे पहला समाचार पत्र ‘मूकनायक’ 1920 में निकला. यहीं से दलित चेतना का आरंभ माना जा सकता है. उनके नेतृत्त्व में किए गए लाखों लोगों के संघर्षों और कुर्बानियों से दलित वर्गों के बीच शिक्षा का प्रसार हुआ. और दलित वर्गों के शिक्षित लोगों ने अपनी दशा सुधारने के लिए कलम का सहारा लिया. जिससे अंबेडकरवादी साहित्य की शुरुआत हुई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस आंदोलन ने विश्व स्तर पर चल रहे काले साहित्य से भी प्रेरणा प्राप्त की. ब्लेक पैंथर और ब्लेक लिटरेचर की तर्ज पर हमारे यहाँ दलित पैंथर और दलित साहित्य आए. दलित साहित्य यानी दलित वर्गों के लोगों द्वारा रचा गया साहित्य. इसका प्रेरणास्रोत डॉ. अंबेडकर का स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का दर्शन ही था. इस आंदोलन की दलितों में बढ़ती पैठ से घबरा कर ब्राह्मणवादी, पूँजीवादी और साम्राज्यवादी शक्तियों ने अपनी कुटिल चालों से इस साहित्यिक आंदोलन में जातिवादी तत्वों को बढ़ावा दिया. नतीजतन ‘जय भंगी, जय चमार’ जैसी किताबें छपने लगीं. बाबासाहेब का स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का सपना कहीं पीछे छूटता लगने लगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दशा पर पूरे भारत के लोगों के बीच चिंतन हुआ कि इस स्थिति से कैसे निबटा जाए. प्रतिबद्ध विचारकों ने बाबासाहेब के साहित्य में शरण ली और वहीं से इसका जवाब सूझा कि हमारे साहित्य का केवल दलित वर्ग के द्वारा लिखा होना ही काफी नहीं है, इस साहित्य को भगवान बुद्ध, कबीर, जोतिबा फुले और बाबा साहेब आदि के दिखाए मार्ग पर भी चलना होगा. साथ ही दलित वर्गों के बाहर स्त्रियों, अल्पसंख्यकों, पिछड़ों, प्रगतिशीलों और धर्मनिरपेक्षों आदि में जो लोग समानता के समर्थक और जातिवाद के विरोधी हैं, उन्हें भी अपनी लड़ाई में शामिल करना होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चूँकि आज के युग में पूरे भारत और समूचे विश्व की प्रगतिशील चिंतनधारा डॉ. अंबेडकर में पूँजीभूत होती है, और सभी विषयों पर प्रस्थान बिंदु उपलब्ध कराती है. इसलिए इसे नाम दिया—‘अंबेडकरवादी साहित्य’. ‘अपेक्षा’ ने 2004 में अपने संपादकीय का शीर्षक दिया—अंबेडकरवादी साहित्य की अवधारणा. इस संपादकीय में दलित चेतना के जाति-चेतना में बदल जाने और जाति-चेतना के राजनीतिकरण के खतरे का मुकाबला करने के लिए डॉ. अंबेडकर की सम्यक दृष्टि को इस प्रकार प्रस्तुत किया—‘अंबेडकरवाद जाति की श्रेष्ठता, शुद्धता और पवित्रता के जातिशास्त्र का विनाश करके समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे जनवादी और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर समाजशास्त्र का नया सिद्धांत प्रतिपादित करता है जिसे अंबेडकरवादी समाजशास्त्र कहा जाता है. इसलिए अंबेडकरवादी साहित्य की अवधारणा का आधार अंबेडकरवाद है, अंबेडकरवादी चिंतन है, अंबेडकरवादी समाज-दर्शन है और अंततः अंबेडकरवाद की सम्यक दृष्टि है.’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपेक्षा के साथियों ने अपनी पत्रिका को अंबेडकरवादी साहित्य का मुखपत्र घोषित किया. तब से यह निरंतर अंबेडकरवादी साहित्य की मशाल ले कर चल रही है. धीरे-धीरे यह शब्द राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति हासिल करता जा रहा है. इसी कड़ी में 2007 में अंबेडकरवादी विचारधारा के लेखकों की कहानियों का एक संकलन निकला, जिसमें अंबेडकरवादी विचारधारा में पगे रचनाकारों और रचनाओं को शामिल किया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंबेडकरवादी साहित्य की सबसे मूलभूत विशेषता ब्राह्मणवादी सोच को बेनकाब करना है. ब्राह्मणवादी सोच यानी किसी को जन्म के आधार पर विशेषाधिकारों से संपन्न कर देना, उसे देवता का दर्जा दे देना, चाहे वह कितना ही बेकार, अज्ञानी, कुटिल ही क्यों न हो. यह सोच केवल ग्रामीण या अनपढ़ लोगों में ही नहीं है, बल्कि स्कूलों के प्रधानाचार्यों तक में है. इसी चीज को बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया है विपिन बिहारी ने अपनी कहानी ‘आपकी जात छोटी है’ में. इस कहानी में एक अमीर स्कूल के छात्रावास में रह रहे लड़कों की जातिवादी मानसिकता तो उजागर होती ही है, जो नितांत का ऐसे प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ना बर्दाश्त नहीं कर पाते, उन्हें तो एक शैड्यूल्ड कास्ट दीन-हीन मैला कुचैला ही भाता है, वही उनके अहं को तुष्टि देता है. यदि कोई सुखी घर का लड़का, जो पढ़ाई और खेलों में उनके वर्चस्व को चुनौती भी दे, वह उनके बर्दाश्त के बाहर होता है. पर इससे भी दुखद आश्चर्य तो तब होता है, जब उनका प्रधानाचार्य सही का पक्ष लेने के बजाय नितांत को ही समझाता है कि तुम्हें ऐसे स्कूल में नहीं पढ़ना चाहिए. और सवर्ण लोगों से हार जाना चाहिए ताकि वे तुमसे नाराज न हो जाएँ. लेकिन इस कहानी की असल चीज़ है ललित का अपने बेटे को कहना कि “डरना नहीं, बेटा, जितना डरोगे, उतना ही डराएँगे तुम्हें.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता का नशा आदमी को इतना मगरूर कर देता है कि वह अपने से कमज़ोर के साथ जानवर से भी बदतर बर्ताव करने लगता है, उसकी मानवता मर जाती है. ब्राह्मणवादी सोच ने सत्ता के नशे में लाखों करोड़ों लोगों को अनपढ़ और रोटी-रोटी का मोहताज रखा. इसे ईश्वर की मर्जी बताया और मनमानी लूट की. आज भी गरीबों और मजलूमों को कीड़े-मकोड़े मानने की सोच सत्ताधीशों में जब तब दिखाई पड़ जाती है. ‘बाढ़ में वोट’ इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इस कहानी में रतन कुमार सांभरिया वर्णवादी भेदभाव के प्रति विद्रोह की अंबेडकरवादी चेतना का विस्तार कर उसमें सत्ताधारी वर्ग की अहमन्यता और लोगों को कीड़े-मकौड़े मानने वाली सोच के प्रति विद्रोह के आयाम को जोड़ते हैं. इस कहानी में वे पीड़ित वर्ग की जाति बता कर उसे सतही दलित कहानी बनाने के मोह में नहीं पड़ते, बल्कि वे पाठक के मन पर यह छाप छोड़ने में सफल होते हैं कि सभी उत्पीड़ित दलित हैं. सबकी पीड़ा उतनी ही खरी है फिर चाहे उनका धर्म, लिंग या जाति कुछ भी हो. इसलिए सबको मिलकर ‘आकाओं’ और ‘प्रजाओं’ की इस व्यवस्था को बदलने की ज़रूरत है. दलित की परिभाषा में सभी उत्पीड़ितों को शामिल करना अंबेडकरवादी विचारधारा का सही दिशा में विकास करना है, उसे संकीर्णता से मुक्त करना है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. अंबेडकर की विचारधारा से प्रेरित हो दलित वर्गों में आत्म सम्मान हासिल करने की आकांक्षाओं पैदा हुई है लेकिन अपनी गरीबी के कारण उन्हें बार-बार समझौते करने पड़ते हैं. पुन्नी सिंह आकांक्षाओं और मजबूरियों के अंतर्द्वंद्व को अपनी कहानी ‘बच्चे जो स्कूल जाते हैं’ अभिव्यक्त करते हैं. इस कहानी में बाप अपनी माली हालत और ऐबों के चलते अपने बेटे को सुअर काटने के पुश्तैनी काम में लगाना चाहता है, उसकी लानत-मलामत भी करता है, उसे सुअर काटने में दक्ष होते देख असुरक्षित भी महसूस करता है, लेकिन आखिर में आत्म सम्मान हासिल करने का आकांक्षा की ही विजय होती है—‘देख, एक बात तू मेरी मान लेना, तू स्कूल मत छोड़ना.’ अंततः बच्चे को पढ़ाने का सपना जीतता है. कहानी बहुत ही मार्मिक बन पड़ी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वरिष्ठ अंबेडकरवादी लेखिका सुशीला टाकभौरे अपनी कहानियों में जाति के उत्पीड़न के साथ पुरुषवादी मानसिकता के कारण होने वाले उत्पीड़न का आयाम भी जोड़ती है. इस संकलन की उनकी कहानी ‘रामकली’ एक ओर घुमंतू जाति की स्त्रियों के शारीरिक शोषण की मानसिकता को उजागर करती है वहीं ‘कंजर’ समुदाय में व्याप्त स्वाभिमान को भी रेखांकित करती है. ये स्वाभिमान ही असल चीज़ है. यही एक दिन इस दुनिया को बदलेगा. अछूत प्रथा इसी स्वाभिमान को तोड़ने के लिए बनाई गई थी. कितने सुखद आश्चर्य की बात है कि शासक वर्गों के लाख प्रयासों के बावजूद ये स्वाभिमान है कि कम ही नहीं होता, रह रह कर सामने आ जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंबेडकरवादी चिंतन का विरोध ब्राह्मणवादी चिंतन से है, ब्राह्मण जाति के लोगों से नहीं. शिक्षा और राजनीतिक चेतना ने कम ही लोगों में सही, पर सवर्ण वर्ग के लोगों में भी मानवतावादी चेतना पैदा की है. जब तक सवर्ण और अवर्ण लोगों में मिलकर एक समतावादी जातिहीन समाज बनाने की चेतना पैदा नहीं होगी, तब तक ऐसा समाज बनना मुश्किल ही है. ब्राह्मण वर्गों के प्रति आक्रोश अक्सर ब्राह्मण जाति के प्रति आक्रोश में बदल जाता है. तब ऐसे वाक्य निकलते हैं—‘कबीर का गुरु एक भुनगा या कुत्ता हो सकता है,  परंतु एक ब्राह्मण कभी नहीं हो सकता.’ यहाँ सवाल यह नहीं है कि ऐसा हो सकता है या नहीं, यहाँ सवाल है कि जब हम ब्राह्मण जाति के लोगों से नफरत करते हैं, और उनकी अच्छाइयों को भी देखने को तैयार नहीं होते तो क्या एक तरह से हम जातिवाद यानी ब्राह्मणवाद को ही मजबूत नहीं कर रहे होते. अंबेडकरवादी चिंतन सम्यक दृष्टि में विश्वास करता है, जातिवादी दृष्टि में नहीं, इसीलिए वरिष्ठ रचनाकार बुद्ध शरण हंस की कहानी ‘आकाश मेरे पास’ में सब्जी वाली चंपा की, जो सफाईकर्मी समुदाय से है, सच्ची लगन, मेहनत और ईमानदारी देख कर डॉ. शंकर उपाध्याय मेडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी में उसके बेटे का मार्गदर्शन करते हैं जिसके कारण वह सफल हो जाता है. जहाँ यह कहानी एक माँ के सपने के हकीकत में बदलने की कहानी है वहीं यह एक ब्राह्मण के मानवीय पहलू को भी उजागर करती है. और यह मानव के बेहतर होते जाने के प्रति भरोसा भी जगाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब से नौकरियों में एससी एसटी का आरक्षण शुरू हुआ है, लगभग तभी से नकली एससी प्रमाणपत्र बनवा कर नौकरियाँ हासिल करने वाले धूर्त लोग भी रहे हैं. जब कभी कभार इनके बारे में शिकायत मिलती है तो सरकारी तंत्र का रवैया मामला टरकाने और टालने का रहता है. इनकी इंक्वारियाँ 20-25 साल तक चलती रहती हैं. तब तक नकली प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने वाला आदमी रिटायर हो लेता है. इतनी देर से आने वाले फैसले इन्हें बेमानी बना देते हैं. इसी समस्या पर केंद्रित है श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की कहानी ‘होनहार बच्चे’. इस कहानी में नकली प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए सवर्ण कहीं किसी गरीब लाचार एससी को अपना बाप बना लेते हैं तो कहीं किसी मजबूर एससी को पति बना लेते हैं. ऊपर से इन वर्गों का दुस्साहस देखिए कि किस तरह छद्म विनम्रता में अपने स्वार्थ और इरादों को छुपाए रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहरीकरण के बावजूद जाति-विद्वेष लोगों में समाया है. कई सवर्ण तो अपनी स्वच्छता के नखरों के पीछे अपनी छुआछूत की भावना को छिपाते हैं. वे खुद कष्ट उठाते हैं लेकिन दलित व्यक्ति का साथ गवारा नहीं कर पाते. इसी को बड़े ही सशक्त कथानक में बुना है रूप नारायण सोनकर ने अपनी कहानी ‘रैंडमाइज़ेशन’ में. यह कहानी चुनावों के समय चुनाव की ड्यूटी देते अधिकारियों और उनके मातहतों की है. जब वे चुनाव ड्यूटी के पहले वाली रात खाना खा रहे होते हैं, तो जैसे ही उनमें से एक ब्राह्मण अधिकारी को यह मालूम पड़ता है कि प्रेज़ाइडिंग अधिकारी मेहतर जाति का है तो वह एक ही मेज पर बैठकर खाना खाने से मना कर देता है, रात को घोर बारिश होने पर भी अपने प्रेजाइडिंग अधिकारी के साथ एक ही कमरे में सोने से इंकार कर देता है, सारी रात कष्टपूर्वक बरामदे में ही भीगते हुए गुजार देता है. लेखक ने ठीक ही नोट किया है कि ‘कट्टर धार्मिक’ प्रवृत्ति के कुछ अधिकारी सार्वजनिक जीवन में भी छुआछूत बरतते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जातिवाद को आर्थिक और सामाजिक आधार सामंतवाद ने उपलब्ध कराया है. भारतीय आधुनिकता की एक समस्या का एक कारण सामंतवाद का खात्मा न हो पाना है. इसके परिणामस्वरूप कभी दूसरी जाति में शादी करना, कभी दूसरी जाति के व्यक्ति से प्यार करना, कभी अपने ही गोत्र में शादी करना जैसी मामूली बातें हत्या और सामूहिक बलात्कार का कारण बन जाती हैं. ऐसी ही एक घटना को अपनी सशक्त लेखनी से प्रस्तुत किया है मुकेश मानस ने अपनी कहानी ‘अभिशप्त प्रेम’ में. अंतर्जाति विवाह किए राघौ भैया के बच्चा भी हो जाता है. उन्हें धोखे से गाँव में बुलाया जाता है और उनकी पत्नी और बच्चे की नृशंस हत्या कर दी जाती है. दुखद यह है कि यह हत्या करने वाले कोई अपराधी प्रवृत्ति के इक्का दुक्का लोग नहीं होते, बल्कि  आम लोग होते हैं, जिनके भीतर अपने धर्म, अपनी जाति, अपने रिवाजों का इतना मोह और भय बैठा है कि वे इन हत्याओं और बलात्कारों के मूक दर्शक ही नहीं होते बल्कि जंगलियों की तरह उसका उत्सव भी मना रहे होते हैं. सचमुच जुगुप्सा पैदा होती है कि जिस धर्म और सभ्यता ने इतने अमानवीय संस्कार दिए हैं क्या उसे सचमुच धर्म या सभ्यता कहा जा सकता है. कब इन लोगों में इतना साहस पैदा होगा कि वे इस अमानवीय धर्म और सभ्यता को छोड़ सम्यक दृष्टि अपनाएँगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबू राव बागुल की एक कहानी है ‘जब मैंने अपनी जाति छिपाई’. दलितों को जब शहर में नौकरियाँ मिलीं, लेकिन नौकरी के हिसाब से सही इलाकों में रहने को घर नहीं मिले तो जाति-अपमान से बचने के लिए उन्होंने अपनी जाति छिपाईं. उन्होंने अपने नामों के आगे अरोड़ा, आहूजा, शुक्ला, श्रीवास्तव जैसे जातिसूचक शब्द भी जोड़ लिए ताकि वे अपनी सही पहचान को छिपाकर दिन प्रतिदिन के अपमान से बच सकें. युवा कहानीकार अजय नावरिया ने अपनी  ‘मुखौटे’ कहानी की विषयवस्तु इसी को बनाया है. नायिका की एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी लगती है. जब स्कूल की अन्य अध्यापिकाएँ उससे कुरेद कुरेद कर उसकी जाति के बारे में पूछताछ करती हैं तो वह हताश हो जाती है. अगले दिन जब वह नौकरी का इस्तीफा लेकर प्रिसिंपल से मिलती है तो उसे पता चलता है कि उसके साथ ही अधिकांश अध्यापिकाएँ शुक्ला, सैनी, शर्मा जैसे सरनेम होने के बावजूद असल में दलित ही हैं. तो वह चकित रह जाती है. अजय नावरिया की इस कहानी का अंतिम वाक्य है—‘उसने बढ़ कर हाथ थाम लिया था. एक चिड़िया, रोशनदान पर बैठी, रोशनी में नहा रही थी.’ क्या सवर्णों के जातिसूचक शब्द लगा कर ही दलितों की मुक्ति का रास्ता खुलेगा. डर और खौफ के कारण जाति छुपाना तो क्षम्य हो सकता है, परंतु अपनी जाति छुपाने को मुक्ति का दर्शन बना देना, यह चाहे और जो कुछ हो, अंबेडकरवाद तो नहीं हो सकता.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इसके बरक्स अनिता भारती की ‘एक थी कोटे वाली’ की नायिका ‘गीता’ बाबासाहेब के चिंतन की छत्रछाया में पली-बढ़ी है, इसलिए उसे न अपने बारे में कोई ग़लतफहमी है, न स्कूल की सवर्ण अध्यापिकाओं से कोई अपेक्षा है. जब मिसेज सागर को उसने बताया कि वह अंबेडकरवादी है तो अन्य दलित अध्यापिकाओं में खुशी की लहर दौड़ गई. गीता ने अध्यापन का काम इसलिए चुना था कि कम से कम इस पेशे में जातिवाद नहीं होगा, पर अन्य शिक्षिकाओं में जातिवाद देख कर उसने उन्हें ललकारा, उसके ललकारते ही अन्य दलित शिक्षिकाएँ भी अपना आक्रोश व्यक्त करने लगीं. और उनकी संगठित शक्ति से बिना कोटेवालियाँ हतप्रभ हो गईं. यही है असली अंबेडकरवाद—संगठित शक्ति और मुकाबला करने का साहस. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल होता है.’ ऐसी किताबें पढ़कर और उनकी विश्वविद्यालय के अध्यापकों द्वारा की गई व्याख्याएँ, बहसें पढ़कर  सुनकर ही हमारी पीढ़ी ने लोकतंत्र और समानता के संस्कार ग्रहण किए. हमें अपने अध्यापकों पर गर्व होता था. परंतु प्रगतिशील खेमें में भी लड़ाई का मुख्य कारण कबीर या तुलसी की काव्यचेतना न हो कर, ब्राह्मण या क्षत्रिय होना है, जब यह जाना तो ऐसा लगा जैसे, हरिशंकर परसाई के शब्दों में, मुझे किसी एंबुलेंस ने कुचल दिया हो. जातिवादी उत्पीड़न के ऐसे महीन अहसास को अपनी सशक्त कलम से बुना है रजनी दिसोदिया ने ‘एक ग़ैर-साहित्यिक डायरी’ को. बड़े ही शालीन मज़ाकों के सहारे जब ब्राह्मण और क्षत्रिय अपनी प्रशंसा करते हैं तो दलित छात्रों या शिक्षकों पर क्या गुज़रती है, इसका बड़ा ही मार्मिक चित्रण है इस कहानी में. लेखिका को कबीर के विद्वान के ब्राह्मणवादी फिकरे ठीक ही बहुत तकलीफ पहुँचाते हैं. इसमें से निकलने का रास्ता उसके पति के इन शब्दों में व्यक्त होता है—‘उन्हें मानने दो जो वे मानते हैं. बस अपनी मेहनत व संघर्ष की क्षमता पर विश्वास रखो’.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शासक वर्ग की विचारधारा सबसे अधिक मुखर रूप में शंकराचार्य के वेदांत में व्यक्त होती है. शंकराचार्य ने एक सूत्र दिया कि व्यवहारिक सत्य और परमार्थिक सत्य अलग-अलग होते हैं, यानी आप परमार्थ में सभी जीवों में एक आत्मा के निवास को मानते हुए भी व्यवहार में वर्णाश्रमी भेदभाव को मानते रह सकते हैं. यह पाखंड आज भी हमारे उच्च मध्यवर्ग में चला आ रहा है. भारत के उच्च मध्यवर्ग के लोग, चाहे उनकी विचारधारा क्रांतिकारी ही क्यों न हो, अपनी सुख-सुविधाओं को हासिल करने में पीछे नहीं रहते. और अपने लोभ-लालच को सही ठहराने के लिए तरह-तरह के तर्क भी गढ़ लेते हैं. यही बात निम्न मध्यवर्ग के लोगों के मन में बेहद क्षोभ पैदा करती है. उनका अपनी मेहनत का फल भी हासिल न कर पाना और तथाकथित क्रांतिकारी नेताओं का सारी सुख-सुविधाओं वाला जीवन जीना. निम्न मध्यवर्ग के रंजन दुनिया भर के सपने देखते हैं, सुख-सुविधाओं की लालसा करते-करते गंदी बस्ती में अपने दिन काटते हैं. रंजन के जरिये मध्यवर्गीय नैतिकता की पड़ताल करते हैं टेकचंद अपनी कहानी ‘सुअर क्लास’ में. रंजन अपनी ज़ुबानी क्रांति में सारे नेताओं की पोलपट्टी खोलता है, लेकिन खुद भी नशे में चूर कीचड़ में जा गिरता है. रंजन की हालत देख कर लगता है कि हमारा लेखकगण जिस क्रांति का बिगुल बजाते रहते हैं, वह आखिर हो क्यों नहीं पा रही है. मध्यवर्गीय रंजन में नैतिक बल का अभाव ही उसकी सीमा है, उसके पतन का कारण है, केवल विचारों के क्रांतिकारी होने से कुछ नहीं होता, उन्हें साकार करने का नैतिक बल भी होना जरूरी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दलित परिवारों में शिक्षा के कारण जागृति तो आई है, लेकिन अभी भी परंपराओं के नाम पर अंधविश्वास घर किए बैठे हैं. इन अंधविश्वासों और पुरानी मान्यताओं का सबसे अधिक शिकार महिलाएँ बनती हैं. रजत रानी ‘मीनू’ की कहानी ‘वे दिन’ इसी विषय पर है. अच्छे घर यानी संपन्न घर में शादी करने के लिए अंजू के पिता उसके दसवीं की परीक्षा देने तक का इंतज़ार नहीं कर पाते. ससुर और देवर की मदद से वह पेपर देती है और दसवीं पास करती है. लेकिन जब इंटर करना चाहती है, तो उसका पति उसे आगे पढ़ने नहीं देता. इस तरह पढ़ा लिखा दलित स्त्री की शिक्षा और आत्मसम्मान के रास्ते में आ जाता है. और जब उसके बच्चे बड़े हो जाते हैं तो उसे अपने रास्ते से हटाने के लिए उस पर चरित्रहीनता का आरोप लगा देता है. और उसे घर से निकाल देता है. रजत रानी ‘मीनू’ की यह कहानी दलित पुरुषों की पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों को बेनकाब करती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार ने दलितों की हालत सुधारने के लिए गाँवों में ज़मीनों के पट्टे दलितों को बाँटे. पहले तो बंजर ज़मीन के पट्टे बाँटे, जहाँ कहीं बाँटे भी तो उन्हीं को, जो उनके खेतों में बेगार करते थे. और जहाँ बँटे भी वहाँ उन ज़मीनों पर अधिकांश में शक्तिशाली जातियों का ही कब्जा रहा.  इन पट्टों के पीछे के सपनों, दर्द और हताशा को अपनी सशक्त कलम से कृष्ण पाल ‘परख’ ने ‘पट्टा’ कहानी में उकेरा है. दलितों की आपसी रंजिशों और जाटों की कुटिल चालों ने किस तरह इस देश के लोकतंत्र को फेल कर दिया, यह कहानी पढ़ते-पढ़ते आँखों के सामने साकार होने लगता है. कानून बन जाना ही काफी नहीं है, समाज में जातिविरोधी लोकतांत्रिक चेतना का होना भी ज़रूरी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ की ममता की कहानियाँ सभी किताबों में भरी पड़ी हैं, निश्चय ही माँ के प्रेम से बढ़कर कोई प्रेम नहीं होता. ममता की ऐसी ही एक यशोदा कहानी है पूरन सिंह की ‘जब ममता शून्य हुई’. पंडिताइन को बच्चे नहीं होते थे. अपनी एक पुरानी परिचित नर्स से मिल कर अस्पताल से नवजात बच्ची को पालने के लिए ले आती है. पंडिताइन की ममता बरसाती नाले की तरह बाँध तोड़कर बह निकलती है. आठ दिन बीतते न बीतते बच्ची के माँ-बाप बच्ची को लेने आ जाते हैं. पंडिताइन गिड़गिड़ाती है, पैसे का लालच भी देती है. माँ बाप भी एक बार को मानने वाले ही होते हैं  कि नर्स बता देती है कि इसके माँ बाप मेहतर हैं. यह पता लगते ही पंडिताइन एक झटके में बच्ची वापस कर देती है. ममता पर जातिवादी घृणा का ग्रहण लग गया था न. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दलितों में बाबासाहेब की शिक्षा के प्रचार से सबसे बड़ा काम यह हुआ है कि उनमें आत्मविश्वास जगा है. उन्होंने अपने गंदे धंधों को छोड़ कर साफ सुथरे धंधे अपनाए. अपना रहन सहन बदला. एक तरफ तो सवर्ण कहते हैं कि दलित गंदे रहते हैं इसलिए उनके साथ रहना या उन्हें छूना मुश्किल है, दूसरी तरफ जो दलित अपने खानदानी पेशों को छोड़ते हैं, गाँव देहात में जरूरत पड़ने पर उन्हें वही पेशा करने के लिए मजबूर किया जाता है. संत राम आर्य ने ‘कोल्हू के बैल’ में दर्शाया है  कि बच्चे पढ़ लिख कर शहर चले जाते हैं लेकिन माँ बाप अपने पुराने धंधे का मोह नहीं छोड़ पाते और गाँव में ही रह जाते हैं. जब गाँव में ठाकुर को जच्चगी के समय जरूरत होती है, तो वह इन्हें जबर्दस्ती बुला भेजता है. न आने पर परिणाम भुगतने की धमकी तो होती ही है. जब तक ऐसा ही चलता रहेगा तब तक कैसे आएगा इस देश में सामाजिक लोकतंत्र. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर अच्छा पढ़ने वाले बच्चों को छात्रवृत्तियाँ या इनाम बाँटे जाते हैं. इनाम बाँटने वाले एक ही सदिच्छा से प्रेरित होते हैं कि गरीब और होनहार बच्चों की कुछ आर्थिक सहायता हो जाएगी. परंतु यह इनाम उन्हें कितना प्रेरित करता है और कितने ही बच्चे इनाम हासिल करने का सुख हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं इसे विषय बनाया है राजेंद्र बड़गूजर ने अपनी कहानी ‘इनाम’ में. सरपंच की ओर से घोषणा की जाती है कि जो भी बच्चा आठवीं क्लास में प्रथम आएगा उसे पंचायत की ओर से एक हजार रुपये का इनाम दिया जाएगा. यह बात चंद्रशेखर के दिल में बैठ जाती है और वह ठान लेता है कि चाहे कुछ हो जाए वह इस इनाम को हासिल करके ही रहेगा. लेकिन जब चंद्रशेखर प्रथम स्थान हासिल कर अपना इनाम लेने जाता है तो सरपंच साफ मुकर जाता है. सरपंच ने सोचा भी नहीं होता कि कोई दलित सारे गाँव में प्रथम आ जाएगा. इसलिए वह नाट जाता है. हताश बाप जब घर आता है, तो उसका दोस्त रग्घू लड्डू ले के आता है. चंद्रशेखर के प्रथम आने की खुशी में. एक की खुशी सारे दलितों की खुशी बन जाती है. इस तरह वे एक दूसरे की हौसला अफजाई करते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहरीकरण का एक प्रभाव यह हुआ है कि मानव दूसरे की पीड़ा के प्रति संवेदनहीन हो गया है. अपनी संवेदनहीनता को तरह-तरह के बहानों के पीछे छिपाता है. उमेश कुमार सिंह की कहानी ‘जाति की भूल-भुलैया में पंडित जी’ में बस में यात्रा करती एक महिला के बीमार हो जाने के प्रति यात्रियों में फैली संवेदनहीनता को दर्शाया गया है. गरीब और लाचार दलित और चरित्रहीन होते हैं, यह मध्यवर्गीय मान्यता बस के मुसाफिरों में भरी हुई है और वे उस महिला की मदद करने के बजाय उसे चरित्रहीन ठहरा कर अपने अपराधबोध का शमन करते हैं. जब पता चलता है कि वह महिला एक ब्राह्मण पुत्री है तो जो पंडित ज्ञान बघार रहे थे कि भगवान की आरती छूट जाएगी, चुप्पी साध जाते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंजीनियरी और डॉक्टरी के शिक्षा संस्थानों में भी जातिवाद पसरा पड़ा है. मामला रैगिंग को हो या वायवा का, हर जगह भेदभाव देखने को मिलता है. जाति के आधार पर गुट भी बन जाते हैं. अगर कॉलेज राजनीति में कोई दलित जीत गया तो सवर्णों का कहर लाचार दलितों पर बरसता है. इन्हीं किस्सों को जोड़कर कथा में ढाला है मुसाफिर बैठा ने अपनी कहानी ‘दरोगवा’ में. दलितों पर अत्याचार के बाद ऐसे में प्रिंसिपलों का व्यवहार खासा जातिवादी होता है. और वे आत्मसम्मान वाले दलितों का मानमर्दन करने का कोई मौका नहीं छोड़ते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव हो या शहर, दलितों पर अत्याचार अनाचार के किस्से हैं कि थमने में ही नहीं आते. बाबासाहेब की शिक्षा का एक असर यह हुआ है कि दलितों ने संगठित हो कर विरोध करना शुरू कर दिया है. अत्याचार का एक ही इलाज है कि उसका मुकाबला किया जाए. शीलबोधि अपनी कहानी ‘बस! हमें अब लड़ना है’ में हमें यही संदेश देते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाति का जहर न केवल दलितों को दुख पहुँचाता है, वह दूसरों को भी अपना शिकार बनाता है. श्यामलाल राही की ‘विशेसर पंडित’ और आलोक कुमार सातपुते की ‘परिवर्तन’ कहानियाँ दर्शाती हैं कि इनके शिकार सवर्ण यहाँ तक कि ब्राह्मण भी हुए हैं. गरीबी और अभावों भरी जिंदगी जीने वाले विशेसर पंडित जात-पात, ऊँच नीच में ज्यादा विश्वास नहीं करते थे. गरीब ब्राह्मण का दलितों से मेल हो जाता है. यह कहानी एक तरह से वर्ण पर वर्ग के हावी होने को प्रमाणित करती है. आलोक कुमार सातपुते तो गरीबी और अभाव के कारण अपनी बेटी के लिए एक दलित युवक को वर स्वीकारने वाले तिवारी की कथा है. काफी उहापोह के बाद तिवारी दलित युवक को अपना लेते हैं. हालाँकि कई दलित इस बात का विरोध करते हैं, पर जाति तोड़ने की बुनियादी शर्त ही है कि दलितों और गैर दलितों में अंतर्जातीय विवाह हों. सवर्णों में उदारता आए. सवर्णों की उदारता में हर जगह कुटिलता ढूँढना बाबासाहेब के स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के आदर्श के खिलाफ है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जातिवाद का विराट शरीर है, उसकी हजारों बाहें, सैंकड़ों मुख हैं. इन मुखों से वह कहीं उदारता, कहीं कट्टरता, कहीं समानता, कहीं यज्ञों से वातावरण के शुद्ध होने, कहीं परधर्मियों की आलोचना करने तो कहीं संस्कृत का गुणगान करता रहता है. हजारों भुजाएँ नाना प्रकार के हथियारों से सुसज्जित हैं. किसी में कानून, किसी में बाजार, किसी में धर्म, किसी में रक्त की शुद्धता, कहीं भिक्खुओं का अपमान तो कहीं पंडितों का गुणगान. डॉ. अंबेडकर का महत्व इस बात में है कि उन्होंने अपने विराट साहित्य में इस जातिवाद के शरीर, इसकी आत्मा, इसकी नाना कुटिलताओं, अनाचारों को खोल कर रख दिया है. अंबेडकरवादी साहित्य इस जातिवाद के विभिन्न रूपों, आयामों, प्रकारों, किस्मों से हर स्तर पर मोर्चा लेता है. यही कारण है कि इस साहित्य में सवर्ण दृष्टि से ग्रस्त आलोचकों को कभी गंभीरता की कमी दिखती है तो कभी कला पक्ष कमज़ोर दिखता है. कभी इनका संघर्ष मार्क्सवादी समाजवाद के खिलाफ दिखता है तो कभी सांप्रदायिकता के पक्ष में. जो नहीं दिखता वह है अंबेडकरवादी लेखकों की इस देश के वर्ग संघर्ष के प्रति सजगता. और उसमें अपने यानी सर्वहारा के पक्ष में सशक्त ढंग से खड़े होने की पुरजोर कोशिश. इसी संघर्ष को आगे बढ़ाती हैं ये अंबेडकरवादी कहानियाँ. हमें विश्वास है कि इस संग्रह के लेखक और अन्य लेखक भी इस अंबेडकरवादी चेतना का प्रसार करेंगे और इस देश में सच्चे समाजवाद की चेतना के प्रसार में अपना योगदान देंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Blogvani Link --&gt;&lt;a href='http://www.blogvani.com/trans/eng/?url=http://lokmitr.blogspot.com/'&gt;&lt;img src='http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg' alt='www.blogvani.com' style='border:0'/&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-- Blogvani Link Ends --&gt;&lt;img width='1' height='1' 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प्रकाश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13067846901937499742</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCSwp1kYnLQ/R7pXzEJLAEI/AAAAAAAAAAY/JZYuaNR5tzE/S220/DSC00584.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1713771972607997617.post-3542909226010802693</id><published>2008-09-18T22:03:00.003+05:30</published><updated>2008-09-22T09:04:21.250+05:30</updated><title type='text'>संस्कृत का गुणगान -- राष्ट्रवाद या ब्राह्मणवाद</title><content type='html'>इस देश के अधिकतर पढ़े-लिखे लोग भारत की महानता की कुँजी संस्कृत को मानते हैं. औरों की तो बात ही क्या एस.जी. सरदेसाई जैसे बड़े मार्क्सवादी भी इस बात की सिफारिश करते हैं कि यदि इस देश में क्रांति करनी है तो संस्कृत को सीखना होगा. प्रखर मार्क्सवादी आलोचक डॉ.रामविलास शर्मा तो संस्कृत के साथ-साथ वेदों की ओर लौटने का आह्वान करने लगे थे. तो फिर स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती इसका मुक्तकंठ से गुणगान करते हैं तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है. इसके बरअक्स, भारत की लोक-ज्ञान परंपरा प्रारंभ से ही वेदों की अपौरुषेयता और पवित्रता को चुनौती देती रही है. सब जानते ही हैं कि पुराने समय में नास्तिक का भगवान को न मानने वाले को नहीं, वेदों की निन्दा करने वाले को कहा जाता था. चार्वाकों से लेकर भगवान बुद्ध और महावीर स्वामी से होते हुए, सिद्धों और नाथों की पूरी परंपरा, मध्य काल में निर्गुण संत कबीर और रैदास से आधुनिक युग में जोतिबा फूले और डॉ.अंबेडकर तक सभी एक स्वर से वेदों की अपौरुषेयता और पवित्रता को नकारते हैं, उसके वर्चस्व को चुनौती देते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेदों के साथ-साथ संस्कृत की उपेक्षा भी आपको लोक-ज्ञान परंपरा में मिलती है—‘संस्कीरत है कूप जल, भाखा बहता नीर’. फिर भी कुछ लोग संस्कृत की महानता का राग आलापे चले जा रहे हैं. पिछले 100 सालों में इतने शोध हुए हैं, इतनी नई-नई बातें सामने आई हैं लेकिन फिर भी हमारे ‘तथाकथित’ विद्वान, उच्‍च अधिकारी और राजनेता वजह-बेवजह संस्कृत की महानता का राग आलापने लगते हैं. संस्कृत की महानता का जादू इतना शक्तिशाली है कि वह जीवनभर शास्‍त्र परंपरा का विरोध और लोक परंपरा का गुणगान करने वाले हजारी प्रसाद द्विवेदी के मुख से भी प्रकट हो उठता है--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘हिमालय से सेतुबंध तक सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ सौ वर्ष पहले तक एक रही है. यह भाषा संस्कृत थी. भारतवर्ष का जो कुछ श्रेष्ठ है, जो कुछ उत्तम है, जो कुछ रक्षणीय है, वह इस भाषा के भंडार में संचित किया गया है. जितनी दूर तक इतिहास हमें ठेलकर पीछे ले जा सकता है, उतनी दूर तक इस भाषा के सिवा हमारा कोई सहारा नहीं है... हमारे कम से कम छह-सात हजार वर्ष के विशाल इतिहास में अधिक से अधिक पाँच सौ वर्ष ऐसे रहे हैं जिनमें विदेशी भाषा (फारसी, अरबी) का आधिपत्य रहा. दुर्भाग्यवश इस सीमित काल और सीमित अंश में व्यवहृत भाषा का दावा आज हमारी भाषा समस्या का सर्वाधिक जबरदस्त रोड़ा साबित हो रहा है.. इस विशाल देश की भाषा समस्या का हल आज से सहस्रों वर्षों पूर्व से लेकर अब तक जिस भाषा के जरिए हुआ है, उसके सामने कोई भी भाषा न्यायपूर्वक अपना दावा लेकर उपस्थित नहीं रह सकती, फिर वह स्वदेशी हो या विदेशी, इस धर्म के मानने वालों की हो या उस धर्म के. इतिहास साक्षी है कि संस्कृत इस देश की अद्वित्तीय महिमाशालिनी भाषा है : अविजित, अनाहत और दुर्द्धर्ष.’(1)&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; अगर हम प्राचीन भारत के प्रति अंधश्रद्धा नहीं रखते और अपने आसपास की चीज़ों के प्रति आलोचनात्मक रवैया रखते हैं तो हम बड़ी आसानी से देख पाते हैं कि इस एक पैराग्राफ में कितनी तथ्यात्मक भूलें हैं. लेकिन अचरज की बात यह है कि जिन हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी लेखनी से लोकधर्म और लोक संस्कृति की अमर महिमा का बखान किया है वे संस्कृत का गुणगान करते हुए क्योंकर अपने ही द्वारा उल्लिखित तथ्यों की अनदेखी कर जाते हैं. इसका क्या कारण है? आइए, यह जानें कि संस्कृत की महानता के बारे में क्या-क्या ऊँचे बयान जारी किए जाते हैं. और यह भी जानें कि ये बयान सत्यों और तथ्यों की कसौटी पर कितने टिक पाते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृत के बारे में सबसे ज्यादा प्रचार जिस बात का किया जाता है, वह इसकी प्राचीनता का है. कहा जाता है कि यह भारत की, कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि यह दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा है. तथ्यों को तटस्थता से देखने पर जाहिर होता है कि यह बात बिल्कुल ग़लत है. संस्कृत भारत की एकमात्र प्राचीन भाषा नहीं है. जिस समय वेद, पुराण, उपनिषद आदि लिखे जा रहे थे उस समय भी संस्कृत के अलावा अनेक भाषाएँ प्रचलित थीं. यह और बात है कि आज उन भाषाओं के उस समय के ग्रंथ, काव्य, अभिलेख आदि नहीं मिलते. पर इससे यह नतीजा निकालना एकदम ग़लत होगा कि उस समय दूसरी भाषाएँ थीं ही नहीं. उन दूसरी भाषाओं की मौजूदगी के कई प्रमाण दिए जा सकते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला, सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों में प्राप्त भाषा, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका. इससे और कुछ साबित होता हो या न होता हो पर इतना तो साबित होता ही है कि वह भाषा चाहे कोई भी हो पर कम-से-कम संस्कृत नहीं है. यानी कि इस देश में संस्कृत के जन्म से पहले भी एक भाषा बोली जाती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा, आज जब यातायात और परिवहन के साधन इतनी तेज गति वाले हो गए हैं कि सारी दुनिया सिकुड़-सी गई है तब भी इतनी सारी भाषाएँ मौजूद हैं और बोली तो कोस भर में बदल जाती है. तब यह कैसे माना जा सकता है कि जिस समय लोग पैदल या बैल गाड़ियों में यात्रा करते थे उस समय सारे भारत की बोलचाल की भाषा एक ही यानी संस्कृत थी. हम ज्यादा से ज्यादा यह मान सकते हैं कि उस समय का शासक वर्ग या पुरोहित समुदाय अपनी सुविधा के लिए एक भाषा का इस्तेमाल करता था, जिसे देश भर के अभिजात लोगों को सीखना पड़ता था. इसे सीखना पड़ता था, न कि यह उनकी मातृभाषा थी. यही सच भी था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरा, अगर किसी भाषा का लिखित साहित्य न मिले तो उसके अस्तित्व को ही नकार देना, ठीक नहीं है. आज भी सैंकड़ो ऐसी बोलियाँ या भाषाएँ हैं जिनका लिखित साहित्य तो दूर की बात, उनकी अपनी कोई लिपि तक नहीं है. फिर भी वे भाषाएँ हैं और उनके बोलने वाले भी हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौथा, संस्कृत साहित्य में स्त्रियों और शूद्र पात्रों के मुख से साधारण रूप से प्राकृत बुलवाई जाती है. इससे जाहिर होता है कि ये वर्ग संस्कृत नहीं जानते थे, इनकी अपनी भाषा थी, जो प्राकृत थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाँचवाँ, संस्कृत ग्रंथों खासकर स्मृतियों से पता चलता है कि स्त्रियों, शूद्रों और  अंत्यजों के संस्कृत पढ़ने पर रोक थी. यह बात बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संस्कृत भाषा की सामाजिक भूमिका का भी पता चलता है. आप ही बताइए, जब यह भाषा समाज के ज्यादातर लोगों के लिए बोलना मना थी और वे लोग अगर गूँगे नहीं थे तो उनकी कोई भाषाएँ तो होंगी ही. और ये भाषाएँ निश्चित ही संस्कृत नहीं रही होंगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त तथ्यों और तर्कों के आधार पर हम कह सकते हैं कि संस्कृत भारत की एक मात्र प्राचीन भाषा नहीं थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृत के बारे में दूसरी बात यह कही जाती है कि सारी भारतीय भाषाएँ संस्कृत से ही पैदा हुई हैं. कहा जाता है कि वैदिक संस्कृत से लौकिक संस्कृत बनी. अनपढ़-गँवार लोगों के शुद्ध संस्कृत बोल पाने में असमर्थता के कारण यही विकृत हो कर प्राकृत बनी. प्राकृत भी आगे जाकर विकृत हुई तो उससे अपभ्रंश बनी और अपभ्रंश से विभिन्न आधुनिक भारतीय भाषाएँ जैसे हिंदी, मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी आदि पैदा हुई हैं. यह बात एकदम बेबुनियाद है कि संस्कृत से सभी भाषाएँ पैदा हुई हैं. सच तो यह है कि हिंदी आदि आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास संस्कृत से नहीं, बल्कि उसके समकालीन बोले जाने वाली दूसरी भाषाओं से हुआ है. जैसाकि महावीर प्रसाद द्विवेदी अपनी ‘हिंदी भाषा की उत्पत्ति’ नामक किताब की भूमिका में कहते हैं—‘अब तक बहुत लोगों का ख़याल था कि हिंदी की जननी संस्कृत है. यह ठीक नहीं. हिंदी की उत्पत्ति अपभ्रंश भाषाओं से हैं और अपभ्रंश भाषाओं की उत्पत्ति प्राकृत से है. प्राकृत अपने पहले की पुरानी बोलचाल की संस्कृत से निकली है और परिमार्जित संस्कृत भी (जिसे हम आजकल केवल “संस्कृत” कहते हैं) किसी पुरानी बोलचाल की संस्कृत से निकली है. आज तक की जाँच से यही सिद्ध हुआ है कि वर्तमान हिंदी की उत्पत्ति ठेठ संस्कृत से नहीं.” (2)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यही बात‘हिंदी शब्दानुशासन’ की पूर्व पीठिका में आचार्य किशोरी दास वाजपेयी कहते हैं—&lt;br /&gt;“हिंदी की उत्पत्ति उस संस्कृत भाषा से नहीं है, जो कि वेदों में, उपनिषदों में तथा वाल्मिकी या कालिदास आदि के काव्य-ग्रंथों में हमें उपलब्ध है. ‘करोति’ से ‘करता है’ कैसे निकल पड़ेगा? ... दोनों की चाल एकदम अलग-अलग है... (संस्कृत और हिंदी) दोनों का पृथक और स्वतंत्र पद्धति पर विकास हुआ है; परंतु हैं दोनों एक ही मूल भाषा की शाखाएँ. बहुत बड़ी-बड़ी शाखाएँ हैं ये, इतनी बड़ी कि तना कहीं दिखाई ही नहीं देता और इतना विस्तार कि कोई सहसा समझ नहीं पाता कि  कहाँ से ये चली हैं. ... मूल भाषा का नाम तब ‘प्राकृत-भाषा’ रखा गया, जब कि उसका एक रूप ‘संस्कृत भाषा’ कहलाने लगा. वैदिक युग की प्राकृत का कुछ आभास हमें ‘गाथा’ में मिलता है. .. भारत के प्रदेशों में और छोटे-छोटे जनपदों में विभिन्न प्रकार की प्राकृत चल रही थी. भगवान महावीर ने और भगवान बुद्ध ने अपनी-अपनी ‘बोली’ में—अपनी-अपनी प्राकृत भाषा में—जनता को उपदेश दिए. इससे प्राकृत को बहुत बल मिला. महाराजा अशोक के समय प्राकृत राजभाषा हो गई. बुद्ध ने अपनी (मागधी) प्राकृत में ही जनता को उपदेश दिए जो आगे चल कर देश भर की संपत्ति हो गए और वे ऐसी प्राकृत में लिखे गए जिसे वास्तविक ‘मागधी’ नहीं कह सकते. उस प्राकृत का नाम आगे चल कर ‘पाली’ पड़ गया... बुद्ध के आगे-पीछे इस देश में जो प्राकृतें चल रही थीं वे द्वितीय अवस्था की हैं...आगे चल कर इनके रूपों का भी विकास हुआ और होते-होते इतना रूपांतर हो गया कि इस तीसरी अवस्था में आ कर रूप एकदम बदल गए. इन तीसरी प्राकृतों को, या प्राकृत की तीसरी अवस्था के रूपों को, ‘अपभ्रंश’ कहते हैं, जो ठीक नहीं. ‘तीसरी प्राकृत’ कहना ही ठीक है. ... देश भर में जो तीसरी प्राकृत के विविध रूप चल रहे थे, उनका आगे विकास हुआ और ये पूर्ण विकसित रूप ही आज की हमारी प्रांतीय या प्रादेशिक भाषाएँ हैं—बैसवाड़ी, अवधी, ब्रजभाषा, राजस्थानी, बँगला, मराठी, उड़िया, गुजराती आदि.”(3)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महावीर प्रसाद द्विवेदी या किशोरी दास वाजपेयी ही नहीं, राबर्ट काल्डवेल, माधव मुरलीधर देशपांडे, राजमल बोरा भी यही मानते हैं कि प्राकृत संस्कृत से पैदा नहीं हुई है. बल्कि वे इस भ्रम को हानिकारक भी मानते हैं—“संस्कृत और प्राकृत का आपस में संबंध जानने के लिए पहले तो हमें यह भ्रम दूर करना है कि संस्कृत से प्राकृत का जन्म हुआ है. इस भ्रम को पाले रखने से हमें बहुत हानि हुई है.”(4)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने का अभिप्राय इतना ही है कि हिंदी का विकास संस्कृत से न हो कर एक मूल लोकभाषा से हुआ था, जिससे संस्कृत का भी विकास हुआ था. फिर यह ग़लतफ़हमी कैसे फैली इसका एक कारण तो यह तथ्य है कि सभी भारतीय भाषाओं—जैसे बँगाली, हिंदी, मराठी, कन्नड़, तेलुगु आदि—में बड़ी संख्या में संस्कृत के शब्द पाए जाते हैं. इसका यह जवाब दिया जा सकता है कि चूँकि संस्कृत राजकाज और कर्मकांड की भाषा रही है. और यह स्थापित तथ्य है कि जो भी भाषा राजकाज, कर्मकांड या व्यापार की होती है, उसके शब्द जन भाषाओं में प्रचलित हो जाते हैं. ठीक वैसे ही जैसे आज अंग्रेज़ी के बहुत से शब्द अनपढ़ गंवार लोगों की समझ में भी बड़ी आसानी से आ जाते हैं और वे उनका इस्तेमाल भी करते हैं. अगर अंग्रेज़ी शब्दों के चलन के आधार पर कोई यह निष्कर्ष निकाले कि हिंदी आदि भाषाएँ अंग्रेज़ी से निकली हैं, तो कैसा लगेगा. यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि संस्कृत के बहुत से शब्द ऐसे हैं जो विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग अर्थ रखते हैं जैसे ‘चेष्टा’ हिंदी में प्रयास करना है और मराठी में मज़ाक उड़ाना. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे, संस्कृत जानने वाले पुरोहित वर्ग ने जानबूझकर दूसरी भाषाओं के ग्रंथ आदि नष्ट करवाए और हिंदुओं ने हिंदू धर्म न मानने वालों यानी बौद्धों, चार्वाकों आदि के सारे धर्म और विज्ञान आदि के ग्रंथ नष्ट कर दिए. आज उपलब्ध बौद्ध धर्म का सारा वाङ्‍मय तिब्बत आदि से खोज कर निकाला गया है या वहाँ उपलब्ध चीनी, भोट आदि भाषाओं से पालि में अनुवाद करके पुनः सृजित किया गया है. भारत में तो उनका कोई नामलेवा भी नहीं बचने दिया गया. संस्कृत बोलने वाले लोगों के घमंड और धूर्तता ने भारत का विपुल ज्ञान नष्ट करवा दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृत के बारे में तीसरी बात यह कही जाती है कि यह एक विशुद्ध भाषा है, देववाणी है, इसने दूसरी किसी भाषा से कुछ ग्रहण नहीं किया. जबकि इस विषय में हुए आधुनिक अनुसंधान तो यह बताते हैं कि लौकिक संस्कृत की तो बात ही क्या वैदिक संस्कृत में भी दूसरी भाषाओं से बहुत कुछ लिया गया था. जैसाकि निम्‍नलिखित बातों से जाहिर होता है—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. ए.एल. बाशम भारतीय भाषाओं में मौजूद मूर्धन्य ध्वनियों को द्रविड़ प्रभाव से जोड़ते हैं, वे कहते हैं—‘भारतीयों के लिए मूर्धन्य व्यंजन (ट, ठ, ड, ढ और ण) दंत्य व्यंजनों (त, थ, द, ध और न) से बिल्कुल भिन्न हैं,... मूर्धन्य ध्वनियाँ भारोपीय नहीं हैं और ये बहुत आरंभ में भारत के आदिवासियों, आद्यआग्‍नेय अथवा द्रविड़ों से ग्रहण की गई हैं.’(5)&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;2. वहीं विख्यात भाषाविद सुनीतिकुमार चटर्जी ऋग्वेद तक में अनार्य प्रभाव देखते हैं—‘इन अनार्यों से संपर्क तथा स्वाभाविक विकास के कारण आर्यभाषा में और भी परिवर्तन आ गए. धीरे-धीरे वह आर्य (या भारतीय-ईरानी) से भारतीय आर्य भाषा बनती चली गई, जिसका नवीनतम विकसित रूप ऋग्वेद की भाषा में मिलता है.’(6)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. इसी बात को आगे बढ़ाते हुए के.एम.श्रीमाली कहते हैं कि—‘वैदिक साहित्य की तथाकथित संस्कत भाषा में न केवल द्रविड़ भाषा बल्कि प्राकृत भाषा के भी स्पष्ट प्रमाण हैं. ट, ठ, ड जैसी मूर्धन्य व्यंजनों की उपस्थिति द्रविड़ प्रभाव जबकि ऋ के स्थान पर ळ का प्रयोग प्राकृत प्रभाव माना जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4. कृषि संबंधी शब्दावली तथा पेड़-पौधों के लिए प्रयुक्त शब्दों से भी वैदिक साहित्य के रचना काल में विभिन्न भाषा-परिवारों का अस्तित्व दिखाई देता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5. सजातीयता संबंधी शब्द यथा चाचा के लिए काक्क अथवा काका का प्रयोग गैर-संस्कृत ही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6. ऋक्संहिता में मुंडा भाषा के तत्वों की खोज जारी है. भारत के मूर्धन्य भाषाविद स्वर्गीय सुनीति कुमार चटर्जी का तो यहाँ तक कहना है कि वैदिक काल से ही इंडो-यूरोपियन, द्रविड़ और मुंडा भाषा परिवारों के पारस्परिक संबंध इतने घनिष्ठ थे कि हम एक प्रकार की ‘भारतीय भाषा’ के अस्तित्व की बात कर सकते हैं.’(7)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजमल बोरा ने राबर्ट काल्डवेल के ‘ए कंपेरेटिव ग्रामर ऑफ द द्रविडियन एंड साउथ इंडियन फैमिली ऑफ लैंग्वेजेज़’ और माधव मुरलीधर देशपांडे की ‘संस्कृत आणि प्राकृत भाषा’ आदि के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि--“संस्कृत भाषा ने भारतवर्ष की प्रायः सभी भाषाओं के शब्द-समूह को अपनाया और आत्मसात कर लिया है. पता ही नहीं चलता कि ये शब्द संस्कृत में कहाँ से आए. बात यह है कि हम सब संस्कृत को मूल माने हुए हैं. इस प्रकार की धारणा का अंत होना चाहिए.”(8)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब यह बात बिल्कुल साफ है कि एक, संस्कृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा नहीं है; दो, भारत की आधुनिक भाषाएँ संस्कृत से पैदा नहीं हुई हैं और तीन, संस्कृत ने भी दूसरी भाषाओं से काफी कुछ ग्रहण किया है. न केवल यह, बल्कि यह भी कि हमारी आधुनिक भाषाएँ संस्कृत का विरोध करने के कारण ही पनपीं और अपना अस्तित्व बचा पाई हैं. तो फिर हमारे अधिकतर विद्वान और राजनेता संस्कृत को प्रतिष्ठित करने के लिए झूठ पर झूठ क्यों दोहराए जाते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और बात, हमारा अभिजात वर्ग संस्कृत की बात तो करता ही है, साथ ही संस्कृत साहित्य में व्याप्त असमानता और भेदभावपूर्ण मूल्यों के गुणगान में भी लगा रहता है. उनकी आलोचना या उन पर हल्की फुलकी छींटाकशी किए जाने पर भी हिंसक हो उठता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ हमें संस्कृत की सामाजिक भूमिका को देखना होगा. वैसे तो कोई भी भाषा पूरे समुदाय की भाषा होती है. लेकिन संस्कृत पूरे भारतीय/हिंदू समुदाय की भाषा नहीं है और न ही यह कभी पूरे भारतीय समुदाय की भाषा रही है. जो भाषा पूरे समुदाय की भाषा न हो, केवल अभिजात वर्ग की भाषा हो, वह एक प्राकृतिक भाषा कभी नहीं हो सकती. संस्कृत को अपने ही समुदाय के शूद्रों, अतिशूद्रों आदि के बोलने पर रोक लगाई गई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृत के आम बोलचाल की भाषा न होने का एक सबूत यह भी है कि मानव जीवन के अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर बोलते समय संस्कृत भाषा गूँगी और बहरी हो जाती है. जब मजदूरों और किसानों को इसकी जरूरत पड़ती है, तो कन्नी काट जाती है. पर पुरोहितों और शासक वर्ग की भाषा के रूप में यह इतना चिल्लाने लगती है कि दूसरी भाषाओं का अस्तित्व तक मिट जाए. जहाँ इसमें ब्रह्म, परमात्मा, आत्मा तथा परलोक के लिए शब्दों और अर्थों के सैंकड़ों भेद-उपभेद हैं वहीं मजदूर के लिए कोई शब्द नहीं मिलता. आजकल उपलब्ध ‘श्रमिक’ शब्द तो अंग्रेज़ी के ‘लेबर’ के लिए हाल ही में गढ़ा गया शब्द है. इसी तरह ‘बेलदार’, ‘मिस्त्री’ या इन लोगों के औजारों और इनकी जरूरत की चीजों के लिए संस्कृत में शब्दों का घोर अकाल है. इस भाषा में रोजी रोटी कमाने के लिए ‘आजीविका’ या ‘जीविकोपार्जन’ जैसे जटिल शब्द होना और भीख माँगने के लिए ‘दान’ जैसा सरल शब्द होना बताता है कि यह भाषा किस वर्ग के हित साधने के लिए बनाई गई और आज भी बरकरार रखी जा रही है. फारसी आदि विदेशी भाषाओं के वे शब्द ही हिंदी आदि भारतीय भाषाओं में खपकर लोकप्रिय हुए हैं जिनके लिए संस्कृत में कोई शब्द नहीं था या वे जबरन अनपढ़ रखे गए लोगों के लिए बोलने में बहुत कठिन थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि राजा राममोहन राय ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम पिट को 11 दिसंबर, 1823 को लिखे पत्र में कहा था कि शिक्षा की संस्कृत भाषा की पद्धति इस देश को अंधकार में रखने का सबसे सरल रास्ता है. इस भाषा में शिल्पियों, कारीगरों, स्त्रियों, दासों सबको एक समान मान कर ताड़ना का अधिकारी बताया गया है. “इसमें उन्होंने लिखा था कि संस्कृत स्कूल की स्थापना से भारतीय युवकों के मस्तिष्क को व्याकरण की बारीकियों तथा पराभौतिक विभेदों से भर दिया जाएगा जो व्यक्ति और समाज में से किसी के भी लाभ मे नहीं है. शिक्षार्थी केवल वही जान सकेंगे जो भारतीय विद्वानों को दो हज़ार वर्षों से ज्ञात है. उस ज्ञान के बाद के लोगों द्वारा टीका-टिप्पणियों के रूप में की गई माथापच्ची भी जुड़वाई जाएगी. उन्होंने बताया कि संस्कृत भाषा इतनी कठिन है कि उसमें पारंगत होने के लिए किसी मनुष्य को लगभग अपना पूरा जीवन होम करना पड़ता है. तभी कुछ लोगों ने संस्कॉत के अध्ययन को केवल अपने स्वार्थ के हित साधन के लिए अपनाया था. संस्कृत की इसी दुरूहता के कारण ज्ञान को सामान्य लोगों के लिए सुलभ नहीं कराया गया था. सामान्य जनता को अशिक्षित रखने के लिए  संस्कृतज्ञों के पास भाषा की दुरूहता का एक अच्छा बहाना मिल गया था. भाषा को सरल करने से ज्ञान सर्वसुलभ हो सकता था. इसलिए उन्होंने भाषा की दुरूहता को सामान्य जनता के विरुद्ध एक हथियार के रूप में प्रयोग किया था. फिर इस दुरूह भाषा में जो कुछ संग्रहीत था उससे शिक्षार्थी द्वारा किए गए परिश्रम की तुलना में कुछ विशेष लाभ नहीं था.” (9)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन बातों को कृष्ण मोहन श्रीमाली के शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. संस्कृत भाषा कभी भी जन-जीवन की भाषा नहीं थी. यह सब जानते हैं कि कुछ अपवादों को छोड़कर इसके पढ़ने-पढ़ाने और कुल मिला कर शिक्षा ग्रहण करने के अधिकार पर ही समाज के उच्च वर्गों का अधिकार था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2. वैदिक संस्कृति और भारतीय संस्कृति को एक मानने वालों का मत पुष्ट नहीं होता क्योंकि भारतीय संस्कृति का बहुत बड़ा हिस्सा ग़ैर-वैदिक है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. वैदिक संस्कृति को मात्र संस्कृत भाषियों की देन मानना भी ऐतिहासिक प्रक्रिया को नकारना होगा क्योंकि तत्कालीन समाज में अनेक ग़ैर-संस्कृत भाषियों की मौजूदगी को नकारा नहीं जा सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4. आधुनिक भारत की लगभग सभी भाषाओं और लिपियों का जन्म कम से कम एक हजार साल पहले हो चुका था और स्वयं संस्कृत के प्रचार और प्रसार में इनका भी बड़ा हाथ रहा है.(10)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; थोड़े में कहें तो संस्कृत दूसरों की कमाई पर पलने वाले अभिजात वर्ग की भाषा रही है और पालि, प्राकृत, अपभ्रंश से ले कर हिंदी, मराठी, तेलुगु, तमिल आदि भाषाएँ कमेरों, मजूरों, किसानों की भाषाएँ रही हैं. इसीलिए आम जनता से जुड़े शब्दों का इन भाषाओं में अथाह भंडार है. फिर भी संस्कृत का बेवजह का गुणगान क्यों?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसाकि हमने पहले भी कहा है संस्कृत का संबंध दूसरों की कमाई पर मौज-मेला करने वालों से था और उस समय यातायात के साधनों के अविकसित होने और हमारी अर्थव्यवस्था के ग्राम केंद्रित होने के कारण आम लोगों का आपस में मेल मिलाप नहीं था. उनकी भाषाएँ रोज़मर्रा के अनुभवों और जरूरतों तक सीमित थीं. जबकि शासक वर्ग की भाषा यानी संस्कृत, शासक वर्ग की जरूरतों के चलते ख़ासी विकसित हो गई थी. संस्कृत भाषा का विकास दर्शनशास्त्र में शून्यता और अनिर्वचनीयता तक पहुँचा तो काव्य में नारी-शरीर के अंग-प्रत्यंगों के चित्रण तक. जब अंग्रेज भारत में आए तो उन्होंने इस ‘अपने में खोई-अपने तक सीमित’ गाँव आधारित व्यवस्था को तोड़ डाला. यह काम उन्होंने राजनीतिक ताकत से कम, व्यापारिक कुटिलता से अधिक किया. व्यापार के विकास और नए किस्म के शासक वर्ग के उदय के साथ ही हम इन विभिन्न भारतीय भाषाओं को विकसित होता हुआ पाते हैं. वैसे इनका अस्तित्व कम से कम एक हज़ार पहले से मिलना शुरू हो जाता है. मुगल काल में जब आर्थिक प्रणाली में मनसबदारी प्रथा द्वारा दखल दिया गया और एक नई किस्म की व्यवस्था लाई गई उसी समय से हम इन भाषाओं को साहित्यिक, धार्मिक और दूसरे क्षेत्रों में कदम रखता हुआ पाते हैं. सिद्धों के चर्यापद, कबीर की साखियाँ, सूरदास के पद के अलावा रासो परंपरा में भी हम इन भाषाओं की ताकत को महसूस करते हैं. वैसे इसके पहले के काल में पालि की गाथाएँ और अपभ्रंश के कवित्त भी लोगों का मन मोहते नज़र आते हैं. अँग्रेज़ों के आगमन पर तो ये सभी भाषाएँ मानो कमर कस कर लोहा लेने को तैयार दिखती हैं.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे यूरोप में पूँजीवाद ने सामंतवाद के परखच्चे उड़ा दिए वैसा भारत में नहीं हुआ. यहाँ पूँजीवाद को, कमज़ोर होने के कारण, सामंतवाद से समझौता करना पड़ा. इसीलिए यहाँ हमें सामंतवाद का विरोध और समर्थन एक साथ दिखाई देता है. इस संस्कृत-प्रेम का एक रूप विभिन्न भाषाओं की शब्दावलियों को संस्कृत के कृत्रिम शब्दों से भरना भी है. इसी कारण हमें आधुनिक  भाषाओं में सांप्रदायिक, सामंती अवशेष दिखाई देते हैं जो लौट-लौट कर संस्कृत की कलिष्ट शब्दावली के रूप में इन भाषाओं के पाँव की बेड़ी बनते हैं. भाषाओं में ये अवशेष संस्कृत, फारसी या अंग्रेज़ी भाषाओं या इन भाषाओं की शब्दावली के प्रति प्रेम में झलकते हैं. हमारा शासक वर्ग जानता है कि आज संस्कृत को  राजकाज की भाषा नहीं बनाया जा सकता. वैसे अगर यह संभव होता तो हमारा शासक वर्ग सबसे पहले यही करता. चूँकि यह संभव नहीं है इसलिए यह वर्ग इन भाषाओं में संस्कृत शब्दावली ठूँसने की कोशिश करता है ताकि इन भाषाओं को जटिल और अबूझ बनाकर ज्ञान और शिक्षा को अभिजात वर्ग तक सीमित रखा जा सके. जब एक अभिजात वर्ग (संस्कृत समर्थक) का दूसरे अभिजात वर्ग (फारसी समर्थक) से टकराव होता है तो अभिजात वर्ग की लड़ाई को हिंदी और उर्दू के रूप में जनता की लड़ाई में बदल दिया जाता है. इसके लिए अभिजात वर्ग बड़ी कुटिलता पूर्वक शतरंज बिछाता है. क्योंकि इससे आम लोगों का विकास और लोकतंत्र का फैलाव रुक जाता है. नतीजतन दोनों ही अभिजात वर्ग फायदे में रहते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मज़े की बात तो यह है कि इन दोनों ही अभिजात वर्गों की छाती पर मूँग दलने वाला शासक वर्ग यानी अंग्रेज़ी अभिजात वर्ग सबसे ज्यादा फायदे में रहता है. बिल्लियों की लड़ाई में सारी रोटी बंदर के पेट में जाती है. इसकी एक वजह इन अभिजात वर्गों द्वारा एक-दूसरे को परास्त करने के लिए अंग्रेजी भाषी अभिजात वर्ग की मदद लेना है. इस दिलचस्प बंदरबाँट में तीनों अभिजात वर्ग फायदे में रहते हैं, अपनी-अपनी तिकड़मों से ये सभी वर्ग लाभ उठाते हैं. घाटे में रहती है आम जनता. क्योंकि बंदरबाँट का यह घमासान उसी के गाढ़े पसीने की कमाई के लिए होता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मात्र संस्कृत को राष्ट्रीय सम्मान का पर्याय मानना, उसे ही भारत की महानता की भाषा मानना उस भारतीय मानसिकता से कोसों दूर है जिसने भारतीय संस्कृति की असली पहचान बनाई है. दरअसल हमें इस बात की भी पड़ताल करने की जरूरत है कि वेद के निंदक को नास्तिक क्यों कहा गया. उसे अनैतिक क्यों माना गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ यह बताना भी अप्रांसगिक नहीं होगा कि हमारा यह अभिप्राय नहीं है कि संस्कृत भाषा या साहित्य में कुछ भी उपयोगी नहीं है. हमारा इतना ही मतलब है कि ‘संस्कृत’ का गुणगान करने वाली मानसिकता ‘वर्ण-व्यवस्था’ का प्रचार करने वाली अभिजात मानसिकता है. सत्ता के लिए भाषा की जटिलता अपनी सत्ता को सुदृढ़ करने का औजार है.  फिर यह भाषा संस्कृत हो, फारसी हो, संस्कृत-निष्ठ हिंदी हो, अरबी-फारसी-निष्ठ उर्दू हो या अंग्रेज़ी हो. भाषा की जटिलता आम लोगों को ज्ञान से दूर करने और ज्ञान से दूर करके सत्ता से दूर रखने का औजार है. नहीं तो संस्कृत के नाम पर वेदों-पुराणों की हाँक लगाने वालों को बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन और धर्मकीर्ति, महाकवि अश्वघोष याद क्यों नहीं आते. इनकी तो छोड़िए, इन्हें तो कालिदास, भवभूति और बाणभट्ट भी याद नहीं आते. फिर आर्यभट, सुश्रुत, भास्कर, चरक जैसे वैज्ञानिकों को याद करने की कौन कहे. ज्ञान के नाम पर इन्हें सिर्फ कुटिल चाणक्य याद आते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका एक ही जवाब संभव है. और वह है वर्णाश्रम व्यवस्था. वर्णाश्रम व्यवस्था का मूल है ब्राह्मणों की सर्वोच्‍चता. इस पूरे प्रचारित संस्कृत साहित्य में धर्म का व्यवहारिक अर्थ ब्राह्मणों की सेवा करना ही है. जन्म से लेकर मरण तक सारे कर्मकांड ब्राह्मणों की रोजी-रोटी के जरिये हैं. ऋग्वेद का पुरुष सूक्त वर्ण-व्यवस्था के विचार को सबसे पहले प्रस्तुत करता है. बाद के लगभग सभी दार्शनिकों और वैज्ञानिकों ने वेदों द्वारा प्रतिपादित वर्ण व्यवस्था को स्वीकार लिया. अगर उनके विचारों से कहीं वेदों का विरोध हुआ भी तो उन्होंने उसकी उपेक्षा ही की. कारण इतना ही था कि कहीं उनका सामाजिक बहिष्कार न हो जाए. ब्राह्मण वर्चस्व को बनाए रखने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम संस्कृत भाषा पर एकाधिकार था. शूद्र और अतिशूद्र के लिए प्रतिबंधित इस भाषा के जरिये ही ब्राह्मणों ने अपना राज निष्कंटक किया. हमारे देश में वैज्ञानिक सोच के न पनप पाने का एक महत्वपूर्ण कारण सामाजिक बहिष्कार का डर भी था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसीलिए जिन भी दार्शनिकों ने मानव के पक्ष में खड़े होने का जोखिम उठाया उनके पास इसके सिवा कोई चारा न था कि वे वेदों की अपौरुषेयता को, संस्कृत के देववाणी होने को और ब्राह्मणों के महामानव होने की कड़ी आलोचना करें. और यही हुआ भी. चार्वाक, बौद्ध, जैन, सिद्ध, नाथ, निर्गुण संत—भारतीय लोक-ज्ञान परंपरा के सभी विचारक वेदों और संस्कृत के खिलाफ खड़े हैं और लोक और ज्ञान के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं. और आधुनिक भारत में इसी परंपरा को जोतिबा फूले और डॉ. अंबेडकर ने आगे बढ़ाया है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में हम कह सकते हैं कि अगर हमें इस देश में लोकतंत्र, समता, स्वतंत्रता, विज्ञान दृष्टि और न्याय स्थापित करना है तो इस देश के क्रांतिकारी विचारकों—भगवान बुद्ध और महात्मा कबीर—की तरह हमारे पास भी कोई चारा नहीं है, सिवाय इसके कि हम वेदों और संस्कृत के वर्चस्व को चुनौती दें. आज सीधे संस्कृतीकरण का खतरा नहीं है. आज संस्कृत और इसके मानव-विरोधी मूल्य हिंदी आदि भाषाओं की तकनीकी शब्दावली के जरिये हम पर हमला कर रहे हैं. अफसोस की बात है कि जनवादी ताकतों की तरफ से इसका अपेक्षित मुखर विरोध नहीं हो रहा है. उल्टे वे खुद संस्कृत की जटिल पदावली का प्रयोग कर लोक भाषा हिंदी को दुरूह कर रहे हैं.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पादटिप्पणियाँ—&lt;br /&gt;1. हजारी प्रसाद द्विवेदी, भाषा, साहित्य और देश, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण, 1998, पृ.9-13. &lt;br /&gt;2. महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रतिनिधि संकलन, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, 1997, पृ.214.&lt;br /&gt;3. किशोरीदास वाजपेयी, हिंदी शब्दानुशासन, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, 2045 वि., पृ.1-9.&lt;br /&gt;4. राजमल बोरा, समकालीन भारतीय साहित्य-69, जनवरी-फरवरी 1997, पृ.44.&lt;br /&gt;5. ए एल बाशम, अद्भुत भारत, शिवलाल अग्रवाल एण्ड कम्पनी, आगरा, 1997, पृ.321.&lt;br /&gt;6. सुनीति कुमार चटर्जी, भारतीय आर्य भाषा और हिंदी, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पृ.41.&lt;br /&gt;7. कृष्ण मोहन श्रीमाली, धर्म, समाज और संस्कृति, ग्रंथ शिल्पी, दिल्ली, 2005, पृ.176-177.&lt;br /&gt;8. राजमल बोरा, समकालीन भारतीय साहित्य-69, जनवरी-फरवरी 1997, पृ.47.&lt;br /&gt;9. डॉ. धर्मवीर, हिंदी की आत्मा, समता प्रकाशन, दिल्ली, 1984, पृ.76.&lt;br /&gt;10. कृष्ण मोहन श्रीमाली, धर्म, समाज और संस्कृति, ग्रंथ शिल्पी, दिल्ली, 2005, पृ.187-88&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Blogvani Link --&gt;&lt;a href='http://www.blogvani.com/trans/eng/?url=http://lokmitr.blogspot.com/'&gt;&lt;img src='http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg' alt='www.blogvani.com' 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ब्राह्मणवाद'/><author><name>वेद प्रकाश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13067846901937499742</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCSwp1kYnLQ/R7pXzEJLAEI/AAAAAAAAAAY/JZYuaNR5tzE/S220/DSC00584.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1713771972607997617.post-4042515847630833574</id><published>2008-08-10T17:37:00.001+05:30</published><updated>2008-08-10T17:56:44.016+05:30</updated><title type='text'>कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह के काव्य संग्रह ‘बोलो मोहन गाँजू’ का लोकार्पण</title><content type='html'>-अच्युतानंद मिश्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गत 5 अगस्त को साहित्य अकादमी के सभागार में वरिष्ठ क्रांतिकारी कवि स्वर्गीय  कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह के चौथे संग्रह ‘बोलो मोहन गाँजू’ का विमोचन कार्यक्रम हुआ. कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि-कथाकार-आलोचक विष्णुचंद्र शर्मा ने की. उन्होंने कहा कि कुमारेंद्र ने इस संग्रह में नव-उपनिवेशवाद के खतरे सामने रख दिए हैं. पूरी कविता को मैं एक बड़े नाटक के रूप में देखता हूँ. ये वैश्विक संघर्ष से जुड़ी कविताएँ हैं. कविता में जो चरित्र आए हैं वे अफ्रीका में, लैटिन अमरीका में मिल जाएँगे. ध्यान से अगर कुमारेंद्र के कविता कर्म को देखें तो मध्यवर्ग से लगातार संघर्ष उनमें दिखेगा.&lt;br /&gt;आलोचक जवरीमल पारख ने कहा कि कुमारेंद्र की इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कवि लोगों से बात कर रहा है. ये एक तरह की संवादपरक कविताएँ हैं. ये ऐसी कविताएँ हैं जहाँ शहरी मध्यवर्ग की गर्मागर्मी वाली बहस नहीं है बल्कि ये ऐसी कविताएँ हैं जहाँ कवि कुछ सिखाता है, खुद कुछ सीखता है. ये आदिवासियों के व्यापक अनुभव को कविता में तबदील करने वाली राजनीतिक कविता है. इसलिए इन कविताओं में आदिवासियों के जीवन के विस्तार और संकट को रेखांकित किया गया है. &lt;br /&gt;आलोचक डॉ.गोपेश्वर सिंह ने पटना के काफी हाउस में कुमारेंद्र के साथ बिताए क्षणों को याद करते हुए कहा कि हिंदी में जिन कवियों से मैं अत्यंत गहरे रूप में जुड़ा हूँ कुमारेंद्र उनमें पहले नंबर पर आते हैं. वे बहुत मजबूत काव्य चिंतक भी थे. उन्होंने आलोचक आनंद प्रकाश के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि कुमारेंद्र के अप्रकाशित साहित्य को प्रकाश में ला कर वे एक महान कार्य कर रहे हैं. उल्लेखनीय है कि इस संग्रह का संपादन एवं संकलन आनंद प्रकाश ने किया है. &lt;br /&gt;वरिष्ठ कवि असद जैदी ने कहा कि कुमारेंद्र के सजीले व्यक्तित्व की छाप मेरे मन पर हमेशा बनी रहेगी. उन्होंने कहा कि पुस्तक की भूमिका पुस्तक का अभिन्न अंग प्रतीत होती है, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पुस्तक पढ़ते हुए खुशी और बेचैनी दोनों से भर गया. यह संग्रह समकालीन हिंदी कविता का एक दुर्लभ नगीना है.  &lt;br /&gt;कुमारेंद्र की कविताओं का पाठ कवियित्री अनामिका, पायल नागपाल एवं अशोक तिवारी ने किया. खचाखच भरे सभागार में कविता का जादू सर चढ़ कर बोल रहा था. कार्यक्रम का आयोजन साहित्यिक संस्था ‘पीपुल्स विज़न’ और ‘लोकमित्र’ प्रकाशन ने किया. कार्यक्रम का संचालन वेद प्रकाश ने किया और अंत में पीपुल्स विज़न के सचिव रामजी यादव ने धन्यवाद ज्ञापित किया.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Blogvani Link --&gt;&lt;a href='http://www.blogvani.com/trans/eng/?url=http://lokmitr.blogspot.com/'&gt;&lt;img src='http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg' alt='www.blogvani.com' style='border:0'/&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-- Blogvani Link Ends --&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1713771972607997617-4042515847630833574?l=lokmitr.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lokmitr.blogspot.com/feeds/4042515847630833574/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1713771972607997617&amp;postID=4042515847630833574&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1713771972607997617/posts/default/4042515847630833574'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1713771972607997617/posts/default/4042515847630833574'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lokmitr.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह के काव्य संग्रह ‘बोलो मोहन गाँजू’ का लोकार्पण'/><author><name>वेद प्रकाश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13067846901937499742</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCSwp1kYnLQ/R7pXzEJLAEI/AAAAAAAAAAY/JZYuaNR5tzE/S220/DSC00584.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1713771972607997617.post-3325555240134073078</id><published>2008-02-13T09:03:00.000+05:30</published><updated>2008-02-13T09:16:57.084+05:30</updated><title type='text'>विमोचन</title><content type='html'>एक दलित लेखक की पुस्तक का विमोचन था.&lt;br /&gt;महान आलोचक विमोचन के लिए मौजूद थे. प्रकाशक महोदय ने उनका परिचय कराते हुए कहा--&lt;br /&gt;'आज हमारे बीच सदी के सबसे बड़े आलोचक विद्यमान हैं, जिन्होंने हिंदी साहित्य को नई दिशा दी है. स्त्रियों और दलितों के योगदान का विशेष उल्लेख किया है. आज इनके बिना विश्वविद्यालयों में पत्ता तक नहीं हिलता.'&lt;br /&gt;गदगद हुए आलोचक प्रवर ने कहना शुरू किया--'इन प्रकाशक महोदय का हिंदी साहित्य में विशेष योगदान है. इन्हें उभरती हुई प्रतिभाओं की सटीक पहचान है. इन्होंने नए लेखकों को मंच प्रदान किया है. उनकी रचनाओं को प्रकाश में लाए हैं. हिंदी साहित्य में इनका योगदान अविस्मरणीय है. यदि ये प्रकाशक महोदय न होते तो न जाने कितने क्रांतिकारी लेखक गुमनामी के अंधेरे में खो गए होते.'&lt;br /&gt;भाषण के बाद उन्होंने बड़े सलीके से रैपर को खोला और पुस्तक को मुस्कराते हुए बड़ी अदा से कैमरे की ओर किया. चारों तरफ फोटो खिंचने लगे. मिठाइयाँ और नमकीन वितरित होने लगे. पत्रकार उनसे आगामी योजनाओं के बारे में सवाल पूछने लगे.&lt;br /&gt;इसी बीच किसी ने कहा कि लेखक कहाँ है. कोने में सिमटा बैठा लेखक सकुचा गया कि आखिरकार किसी ने उसका ज़िक्र तो किया.&lt;br /&gt;अचानक जैसे प्रकाशक को सुध आई--'हाँ, हाँ, भई तुम भी आगे आओ. ऐ..., ज़रा इनकी भी फोटो खींचना'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Blogvani Link --&gt;&lt;a 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rel='alternate' type='text/html' href='http://lokmitr.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='विमोचन'/><author><name>वेद प्रकाश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13067846901937499742</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCSwp1kYnLQ/R7pXzEJLAEI/AAAAAAAAAAY/JZYuaNR5tzE/S220/DSC00584.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1713771972607997617.post-1453565637027536469</id><published>2008-01-10T22:31:00.000+05:30</published><updated>2008-08-10T17:45:18.583+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='http://blogvani.com/logo.aspx'/><title type='text'>दलित पुनर्जागरण के सवाल</title><content type='html'>आज देश संक्रमण के दौर से गुज़र रहा है जिसमें जहाँ अर्ध-सामंती/अर्ध-बुर्जुआ/अर्ध-उपनिवेशवादी अर्थव्यवस्था पूरी तरह उपनिवेशवादी अर्थ-व्यवस्था में बदलती जा रही है, जिससे पूँजीवादी और समाजवादी ताकतों के अंतर्विरोध और तीखे हुए हैं तो वहीं सामंती समाज-व्यवस्था बाज़ारू समाज-व्यवस्था में रूपांतरित हो रही है, साथ ही लोकतांत्रिक चेतना का विस्तार भी हो रहा है यानी एक तरफ हमारे सामाजिक संबंधों पर बाज़ार की वक्र दृष्टि पड़ रही है तो दूसरी ओर समाज में लोकतंत्र का विस्तार भी हो रहा है. &lt;br /&gt;उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में हमारे देश में सामाजिक आंदोलनकारी मार्क्स, गांधी, लोहिया और अंबेडकर के चिंतन से प्रभावित रहे हैं. डॉ. अंबेडकर के चिंतन से प्रभावित लोग  चाहे मीडिया में अपनी जगह बनाने में कामयाब न हुए हों परंतु सतह के नीचे बहती अंतर्धारा के रूप में हमेशा विद्यमान रहे हैं. आज अंबेडकरवादी साहित्य और चिंतन ने मुख्यधारा के मंचों पर अपनी जगह बना ली है. &lt;br /&gt;क्या है यह अंबेडकरवादी विचारधारा? इसका दूसरी क्रांतिकारी विचारधाराओं के साथ क्या रिश्ता है? इस देश में लोकतंत्र की प्राचीन काल से बहती आ रही धारा के साथ इसका क्या रिश्ता है? आज प्रमुखता पा रही सांप्रदायिक विचारधारा के प्रति इसका क्या नज़रिया है? इस विचारधारा के अपने क्या अंतर्विरोध हैं? इन्हीं सब सवालों से जूझती है डॉ. तेज सिंह की पुस्तक ‘दलित समाज और संस्कृति’.&lt;br /&gt;लेकिन तेज सिंह इन सवालों पर अकादमिक तरीके से विचार करने की बजाय एक आंदोलनकारी की तरह इनसे टकराते हैं. कार्ल मार्क्स की तरह वे भी मानते हैं कि ‘दर्शन का कार्य समाज की व्याख्या करना नहीं, इसे बदलना है.’ &lt;br /&gt;यह पुस्तक उनके विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों का संग्रह है इसलिए कई जगहों पर दुहराव भी दिखाई पड़ता है. लेखों का प्रकाशन वर्ष न दिया जाना और संदर्भ-सूची न होना इस पुस्तक को पढ़ते समय बार-बार खटकता है. &lt;br /&gt;इस किताब के कई लेख मार्क्सवादियों और अंबेडकरवादियों के अंतर्विरोधों पर हैं. डॉ. तेज सिंह का महत्व इस बात में है कि एक, वे इस बहस में अंबेडकर के साथ खड़े हैं परंतु मार्क्स को अपने शत्रु के रूप में नहीं देखते. दो, शत्रु के रूप में हिंदू फासीवादियों की पहचान करते हैं जो उनकी वैचारिक प्रखरता और साहस को जाहिर करता है. तीन, जातिवाद को एक तरफ सामंतवाद से जोड़ते हैं तो दूसरी तरफ साम्राज्यवाद से. चार, साम्राज्यवादियों की नई शब्दावली पर मुग्ध नहीं होते और उसके पीछे छिपे उनके शोषणकारी मनसूबों की सही पहचान कर लेते हैं.&lt;br /&gt;वे अपने लेख ‘अम्बेडकर वादी विचारधारा और समाज’ में विचारधारात्मक संघर्ष को कुंद करने में बाजारवाद की भूमिका की आलोचना करते हुए कहते हैं—‘बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद की संस्कृति और विचारधारा ने मनुष्य की वैचारिक-स्वतंत्रता और सोच को कुंद करना शुरू कर दिया है. सही अर्थों में यही उत्तर-आधुनिकता है, यही भूमंडलीकरण है जिसमें विचारधारा का अंत कर दिया गया है; तब उसमें मनुष्य का अंत भी निश्चित ही है। इस तरह भूमंडलीकरण और उदारीकरण की प्रक्रिया अमरीकी साम्राज्यवाद की संस्कृति और विचारधारा के विस्तार की प्रक्रिया का ही हिस्सा है.’ (पृष्ठ 14) &lt;br /&gt;  भारतीय समाज के शत्रुओं की पहचान को रेखांकित करते हुए वे अगले लेख ‘अंबेडकरवाद, वामपंथ और दक्षिणपंथ’ में डॉ. अंबेडकर को उद्धृत करते हैं—‘मेरे खयाल से ऐसे दो शत्रु हैं जिनसे इस देश के मजदूरों को निपटना ही होगा. वे दो शत्रु हैं—ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद’. वे लगे हाथ ब्राह्मणवाद की अपनी समझ को भी स्पष्ट कर देते हैं—‘ब्राह्मणवाद से मेरा आशय एक समुदाय के रूप में ब्राह्मणों की शक्ति, उनके अधिकारों और हितों से नहीं है’ बल्कि ‘ब्राह्मणवाद से मेरा मतलब है—स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की भावना का निषेध. उस अर्थ में यह सभी वर्गों में व्याप्त है और सिर्फ ब्राह्मणों तक ही सीमित नहीं है, हालाँकि यह बात अपनी जगह बिल्कुल सही है कि वे ब्राह्मण ही थे जो इस निषेधात्मक भावना के आदि प्रणेता और प्रवर्तक रहे. यह ब्राह्मणवाद जो सर्वत्र व्याप्त है और जो सभी वर्गों के विचारों और कार्यों को नियंत्रित-निर्देशित करता है, एक अकाट्य सच्चाई है.’ (पृ.25-26)&lt;br /&gt;वे ठीक ही सांप्रदायिकता को जातिवाद से जोड़ते हैं—‘हमें मान लेना चाहिए कि जो जितना जातिवादी है वह उतना ही बड़ा सांप्रदायिकतावादी भी है. कम से कम भारत में सांप्रदायिकता का आधार जाति और धर्म है जिसके मेल को आधुनिक भाषा में हिंदुत्व कहा जाता है. दूसरे अर्थों में इसे हिंदू साम्राज्यवाद भी कहा जा सकता है.’ और दलित बुद्धिजीवियों की कसक उनके इन वाक्यों में प्रकट हो उठती है—‘इस हिंदू साम्राज्यवाद के खिलाफ वामपंथियों ने कभी संघर्ष नहीं चलाया. उनके राजनीतिक संघर्ष में सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद तो है लेकिन इन सबसे गठबंधन करके सत्ता-सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक-आर्थिक सत्ता भी, पर काबिज होने वाला ब्राह्मणवाद उनकी आँखों से हमेशा ही ओझल रहता है. जातिवादी समाज-व्यवस्था को सामंती-अर्द्ध-सामंती अवशेष बताकर ब्राह्मणवाद को हाशिए पर डाल देना हिंदू साम्राज्यवाद को ही मजबूत करना है...वामपंथी ताकतों ने बाहरी साम्राज्यवाद के खिलाफ तो संघर्ष चलाया लेकिन अंदर के साम्राज्यवाद यानी हिंदू साम्राज्यवाद के खिलाफ कोई संघर्ष नहीं चलाया. यही वजह है कि अधिकांश वामपंथियों के अंदर अभी भी ब्राह्मणवाद घर बसाए हुए है.’ पृ.32-33)&lt;br /&gt;जाति व्यवस्था ब्राह्मणवादी विकृत मानसिकता की देन है जिसे  डा. अंबेडकर ने ठीक ही अप्राकृतिक विभाजन माना है. वे लिखते हैं—‘इसलिए डॉ. अंबेडकर ने वर्ण विभाजन को न तो वर्ग विभाजन माना और न श्रम विभाजन ही. जबकि देश के कई मार्क्सवादियों ने वर्ण विभाजन को स्वाभाविक विभाजन मानकर एक प्रगतिशील कदम माना है; ठीक उसी तरह जैसे श्रम विभाजन के आधार पर होने वाला वर्ग-विभाजन. डॉ. रामविलास शर्मा का यही तर्क रहा है. इस तरह देश के ऐसे मार्क्सवादियों ने वर्ण-व्यवस्था के तहत होने वाले श्रेणीबद्ध-विभाजन को ही वर्ग-विभाजन मान लिया है और प्रकारांतर से जातिप्रथा का ही समर्थन कर दिया है. सीधे-सीधे जातिप्रथा का समर्थन करने पर उन्हें प्रतिक्रियावादी घोषित किए जाने का डर था तो घुमा फिराकर वर्ण-विभाजन को वर्ग-विभाजन बता दिया. इसे इनका मार्क्सवादी चिंतन नहीं, ब्राह्मणवादी चिंतन कहा जाना चाहिए.’ (पृ.37)&lt;br /&gt;डॉ. अंबेडकर के प्रति मार्क्सवादियों की दुविधा पर उन्होंने विस्तारपूर्वक विचार किया है. ‘अंबेडकरवाद और मार्क्सवाद का द्वंद्वात्मक संबंध’ शीर्षक लेख में उन्होंने मार्क्सवादियों के पक्ष को इन शब्दों में प्रस्तुत किया है—‘वामपंथियो का एक बहुत बड़ा तबका ... यह मानता रहा है कि भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में जातिप्रथा ने कोई अवरोध पैदा नहीं किया. अपनी इसी स्थापना के चलते वामपंथियों ने जातिप्रथा के प्रभाव को कमतर आँकते हुए उसके विघटनकारी तत्वों की ओर ध्यान नहीं दिया. वे यह भी नहीं मानते हैं कि जातिप्रथा ने ही सामाजिक-भेदभाव के विभिन्न औजारों को पैदा करके समाज को विभिन्न जातियों-उपजातियों में बाँटकर सामाजिक अलगाव की प्रक्रिया को और मजबूत आधार प्रदान किया है तथा वर्गहीन समाज के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा पैदा की है. इसके विपरीत यह मानते रहे हैं कि दलितों के पास अंबेडकर जैसे प्रख्यात नेता के नेतृत्व के बावजूद अछूतों के महान संघर्ष, छुआछूत के खात्मे के वांछित नतीजों तक पहुँचने में नाकामयाब रहे हैं. वे यह भी मानते हैं कि ब्राह्मणवाद विरोधी संघर्ष और धर्मपरिवर्तन के जरिए बौद्ध बन जाने जैसे ‘शार्टकट’ रास्तों से दलितों पर होने वाले अत्याचारों और जातिभेद आदि की समस्या का हल नहीं हो सका है. इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि डॉ.अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण करके मार्क्सवाद पर सीधा प्रहार किया है और वर्ग संघर्ष से ध्यान हटाकर वामपंथी शक्तियों को कमज़ोर किया है.’ (प-.42-43) उन्हें लगता है कि ‘वामपंथियों की सबसे बड़ी समस्या डॉ. अंबेडकर द्वारा धर्म को स्वीकार कर लेने की रही है—वह भी बौद्ध धर्म को. उनकी दृष्टि में अगर डॉ.अंबेडकर हिंदू धर्म में बने रहकर जातिवाद के खिलाफ संघर्ष करते तो उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती. क्योंकि वे खुद हिंदू धर्म में रहते हुए वर्ग-संघर्ष पर लंबी चौड़ी बातें करते हैं तो दूसरी तरफ जातिभेद का विरोध करते हैं पर वर्ण व्यवस्था को मजबूत करने वाले ब्राह्मणवाद पर चुप्पी साधे रहते हैं.’ (पृ.43) तेज सिंह की यह बात बेबुनियाद तो नहीं लगती. &lt;br /&gt;डॉ. अंबेडकर के पक्ष को रखते हुए वे ‘हिंदुत्व का दर्शन’ नामक पुस्तक से उन्हें उद्धृत करते हैं—‘संभवतः वर्तमान हिंदू मार्क्सवाद के घोर विरोधी हैं. इसके पीछे कारण यह है कि मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत से वे बहुत ही भयभीत हो जाते हैं. लेकिन वही लोग यह भूल जाते हैं कि भारत न केवल वर्ग-संघर्ष, वर्ग युद्ध की भूमि बन चुका है.’ डॉ.तेज सिंह बताते हैं कि अंबेडकर तो वर्ग-संघर्ष को नहीं भूले लेकिन वे (वामपंथी) खुद वर्ण व्यवस्था को मजबूत करने वाले ब्राह्मणवाद पर चुप्पी साधे रहते हैं.&lt;br /&gt;क्या डॉ. अंबेडकर समाजवाद के विरोधी थे? क्या वे पूँजीवाद के समर्थक थे? नहीं, नहीं. वे समाजवाद के ही समर्थक थे. उनके शब्द-शब्द से जाहिर होता है कि वे राज्य नियंत्रित आर्थिक विकास चाहते थे. जबकि आज हमारे प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था में कम से कम दखल की तरफदारी कर रहे हैं. डॉ.अंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ में इन सवालों पर अपनी राय रखी है. जैसाकि तेज सिंह बताते हैं—‘एक अर्थ में डॉ. अंबेडकर ने सर्वहारा की तानाशाही का विरोध किया है पर समाजवादी व्यवस्था का नहीं. वे राज्य के नियंत्रण में नई समाज व्यवस्था के लिए ऐसी आर्थिक व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे जिसमें संपत्ति का समान वितरण हो, कृषि पर राज्य का स्वामित्व हो, सामूहिक खेती की व्यवस्था हो और बीमा का राष्ट्रीयकरण हो, इसके साथ-साथ वे तीव्र औद्योगीकरण की जरूरत को भी महसूस करते थे.’ (पृ.51) &lt;br /&gt;महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. तेज सिंह मतभेदों के बावजूद मार्क्सवाद को अंबेडकरवाद का दुश्मन नहीं मानते—‘अगर जातिविहीन-वर्गविहीन समाज का निर्माण करना है तो दलितों और कम्युनिस्टों—दोनों को ही इन समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए क्योंकि हिंदू फासीवाद आपके घर दस्तक दे रहा है.’ (पृ.52) &lt;br /&gt;मार्क्सवाद को दुश्मन तो डॉ.अंबेडकर भी नहीं मानते थे. उनका गुस्सा तो तत्कालीन मार्क्सवादियों की जातिगत शोषण के बारे में साजिशी चुप्पी पर था. कितनी विडंबना की बात है कि मार्क्सवादी आज भी दलितों को अपने एजेंडे पर ही लाना चाहते हैं, उनके जातिगत शोषण पर अख़बार या टीवी चैनलों पर बयान जारी करने से ज्यादा कुछ नहीं करना चाहते. जब दलित जातिवाद का सवाल उठाते हैं तो मार्क्सवादी उन्हें वर्ग-संघर्ष और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत समझाने लगते हैं. लेकिन जाति, धर्म, लिंग और भाषा को द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की कसौटी पर कसना उन्हें नहीं भाता. तेज सिंह ने अपनी पुस्तक में जाति, धर्म और लिंग पर तो बात की है, पर भाषा के पहलू को छोड़ दिया है. &lt;br /&gt;आज कुछ दलित विचारक शब्दों की बाजीगरी कर हिंदू धर्म के साथ एक सुविधापूर्वक लाइन ले रहे हैं ताकि भाजपाई सरकारें उन्हें उपकृत कर सके और जो किसी संकोच के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, वे भारत के प्रगतिशील लेखकों और लोकतंत्र के पक्षधरों पर तीखा आक्रमण कर रहे हैं. जैसे भगवान बुद्ध, प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी, जवाहर लाल नेहरू, पुरुषोत्तम अग्रवाल, मैनेजर पांडे, मैत्रेयी पुष्पा, रजनी तिलक, रमणिका गुप्ता, अनिता भारती, प्रभा खेतान, कम्युनिस्टों आदि पर. प्रगतिशील परंपरा का विरोध करने का मतलब भी एक तरह से सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों का समर्थन करना ही होता है. क्योंकि वैसे भी इन्होंने कहीं भी इन शक्तियों के खिलाफ एक शब्द तक नहीं कहा, अलबत्ता कलावादी अशोक वाजपेयी जैसों की तारीफ जरूर की हैं. &lt;br /&gt;तेज सिंह का प्रखर व्यक्तित्व इस कुहासे को छाँटता है और दलित लेखकों और समाज के सामने इन फासीवादी ताकतों के असली मनसूबों का पर्दाफाश करता है. वे आर.एस.एस. के जन विरोधी और दलित विरोधी रवैये को उजागर करते हैं. साथ ही उनके फासीवाद के चरित्र की ठीक पहचान करते हैं—‘भारत में फासीवाद का मूल चरित्र नस्लवादी नहीं जातिवादी है.’ ‘भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हिंदुत्व को एक जीवन पद्धति मानकर संवैधानिक मोहर लगाने के बावजूद हिंदुत्व का फासीवादी चरित्र खत्म नहीं हो जाता.’ (पृ.55) अपने ‘हिंदुत्व का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ शीर्षक लेख में उन्होंने भाजपा शासित राज्यों में हाल ही में घटी बहुत सी घटनाओं के उदाहरण से दिखाया है कि किस तरह भाजपा-आर.एस.एस. दलित विचारधारा और साहित्य का सारी लोक-लाज छोड़ विरोध करते हैं. इसीलिए डॉ. अंबेडकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि किसी भी कीमत पर हिंदू राज (राष्ट्र) को रोकना ही होगा. अगर हिंदू राज एक सच्चाई में बदल जाता है तो यह इस देश के लिए सबसे बड़ी विपत्ति होगी. उन्होंने हिंदुओं की उदारतावादी अपील को भी खारिज कर दिया था. वे हिंदू कितनी ही उदारतावादी बातें कहें पर उससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हिंदूवाद हर लिहाज से लोकतंत्र विरोधी है और वह स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के लिए एक ख़तरा है.’ (पृ.73) &lt;br /&gt;संघ और विश्व हिंदू परिषद के जरिये कट्टरपंथी सवर्ण लोगों की रणनीति धार्मिक उन्माद फैला कर सांप्रदायिक हिंसा को एक ‘हथियार’ के रूप में इस्तेमाल कर दलित-आदिवासी-पिछड़ा समाज के लोगों की क्रांतिकारी चेतना को कुंद कर जाति और धर्म का वर्चस्व स्थापित करने के लिए उनका हिंदूकरण करने की रही है. तेजसिंह कहते हैं—‘दलितों के धर्म-परिवर्तन को रोकने के लिए ही हिंदू पुनरुत्थानवादी ताकतों ने सांप्रदायिकता का सहारा लिया है ताकि देश में सांप्रदायिक भावनाएँ उभारकर दलित-पिछड़ों की एकता तोड़कर उन्हें मुसलिम-सिख-ईसाइयों के खिलाफ एकजुट किया जा सके.’ (पृ.112)&lt;br /&gt;और इसे रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए—‘हिंदू राष्ट्र के आतंकवादी चरित्र को हम दलित-पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक वर्गों की एकजुटता और एकता के आधार पर ही ध्वस्त कर सकते हैं. यह एकता और एकजुटता सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर ही नहीं सांस्कृतिक स्तर पर भी होनी चाहिए क्योंकि सांस्कृतिक एकता के बिना हिंदूवादियों की इस चुनौती को ध्वस्त नहीं किया जा सकता.’ (पृ.114)&lt;br /&gt;दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों की एकता की जरूरत और उसके रास्ते में आने वाली रुकावटों तथा उन्हें दूर करने के तरीकों पर तेज सिंह अपने अगले तीन लेखों ‘इक्कीसवीं सदी में दलित समाज के सामने चुनौतियाँ’, ‘दलित समाज की वैचारिक-सांस्कृतिक एकता’ और ‘दलित-पिछड़ा वर्ग की सामाजिक-सांस्कृतिक एकता का सवाल’ में तफसील से विचार करते हैं. इनमें वे राजनीतिक से ज्यादा सांस्कृतिक एकता के महत्व को रेखांकित करते हैं. वे बार-बार आगाह करते हैं—‘राजनीतिक स्तर पर की गई एकता अस्थायी होगी और वह व्यक्तिगत स्वार्थों तथा वर्ग हितों के टकराते ही एक क्षण में टूटकर बिखर जाएगी. इसलिए दलित वर्ग की सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक धरातल पर विकसित होने वाली एकता ही स्थायी होगी.’ (पृ.123) &lt;br /&gt;वे जाति से लड़ने को ठीक ही सच्चे लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत मानते हैं—‘अगर जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना करनी है तो हमें जाति आधारित समाज-व्यवस्था का समर्थन करने वाले ब्राह्मणवाद और उसका पोषण करने वाले सामंतवाद को जड़ से खत्म करना होगा तथा जनवादी और लोकतांत्रिक मूल्यों और अधिकारों से वंचित करने वाली पूँजीवादी-व्यवस्था और उसकी विजय का गौरवगान करने वाली साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध लंबा संघर्ष करना होगा.’ (पृ.123)&lt;br /&gt;वे अगले लेख ‘सामाजिक-अलगाव की संस्कृति के खिलाफ संघर्ष’ में ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष की लंबी परंपरा को चीन्हते हैं—‘यह भी सच्चाई है कि ब्राह्मणों के वर्चस्व और उसकी अमानवीय और असमानता की विचारधारा (ब्राह्मणवाद) के खिलाफ विद्रोह की लंबी परंपरा रही है. अंबेडकरवादी आंदोलन विद्रोह की इसी लंबी परंपरा में विकसित हुआ है.’ (पृ.134)&lt;br /&gt;उनकी एक महत्वपूर्ण स्थापना है मध्यकालीन संत आंदोलन को ‘दलित पुनर्जागरण’ मानना—‘लंबे अंतराल के बाद दूसरा प्रयास बौद्धों और लोकायतों की परंपरा में ही सिद्धों-नाथों ने किया जिनमें अधिकांश निम्न समुदायों से आए थे. यह पूरी तरह से सांस्कृतिक आंदोलन था जिसकी जमीन पर मध्ययुग का दलित-पिछड़े वर्ग का सांस्कृतिक आंदोलन विकसित हुआ जिसे भ्रमवश कुछ ब्राह्मणवादी विचारधारा के समर्थक विद्वान भक्ति आंदोलन कहते हैं. यह वास्तव में दलित-पिछड़े वर्ग के कवियों का सांस्कृतिक आंदोलन था जिसमें सामाजिक-धार्मिक सुधार की भावना प्रबल थी और जो दलित पुनर्जागरण के साथ शुरू हुआ था. भारत में पहला दलित पुनर्जागरण मध्ययुग में दलित-पिछड़े वर्ग के कवियों की प्रेरणा से शुरू हुआ था-ठीक यूरोप के पुनर्जागरण की तरह.’ (पृ.135)&lt;br /&gt;तेज सिंह जहाँ एक ओर अंबेडकरवाद-मार्क्सवाद के अंतर्संबंधों पर विस्तारपूर्वक अपनी बात रखते हैं वहीं वे दलितों के वैचारिक स्खलन को भी उतनी ही गंभीरता से लेते हैं. इस दृष्टि से उनका सबसे महत्वपूर्ण लेख है ‘दलित धर्म और दर्शन’. इस लेख में उन्होंने आज दलितों के स्वयंभू मसीहाओं के अंबेडकर विरोधी चिंतन को बेनकाब किया है. दलितवाद के नाम पर ये लोग जातिवादी और स्त्रीविरोधी विचार फैलाकर दलितों को दिग्भ्रमित कर रहे हैं. वे बताते हैं—‘डॉ. धर्मवीर ‘कबीर का धर्म’ कबीर के आलोचकों के आधार पर चलाना चाहते हैं और दलितों को भी सलाह देते हैं कि वे बौद्ध-धम्म के बजाय कबीर के धर्म को अपना धर्म स्वीकार करें. इस प्रकार वे कबीर को एक साहित्यकार के स्थान पर धर्म-उपदेशक बनाने पर तुले हुए हैं.’ और उनका विरोध करते हुए ठीक ही कहते हैं—‘धर्म को साहित्य और संस्कृति से मिला देने का मतलब होता है—फासीवाद और सांप्रदायिकता को जन्म देना.’ (पृ.158-189) &lt;br /&gt;डॉ. तेज सिंह डॉ. अंबेडकर की तरह धर्म का संबंध नैतिकता से जोड़ते हैं—‘धर्म और ईश्वर में अभिन्न संबंध नहीं है परंतु धर्म और नैतिकता में अभिन्न संबंध है.’ डॉ.अंबेडकर धर्म की उत्पत्ति पर विचार करते हुए कहते हैं—‘आदिम समाज का धर्म, जीवन तथा उसकी सुरक्षा से संबंधित था और जीवन की इस प्रक्रिया से ही असभ्य समाज के धर्म की उत्पत्ति हुई है और इसमें ही उसका सार है. क्योंकि आदिम जीवन को जीवन और प्रवास की इतनी अधिक चिंता थी कि उसी को उसने अपने धर्म का आधार बनाया.’ &lt;br /&gt;अगले लेख ‘दलित सामंत का स्त्री विरोधी चिंतन’ में वे दलित लेखकों के स्त्रीविरोधी चिंतन का प्रखर विरोध तो करते ही हैं साथ ही मार्क्सवादी लेखकों द्वारा उनके स्त्री विरोध पर चुप्पी साधने की भी तीखी आलोचना करते हैं. ‘इस बात पर मतभेद हो सकता है कि प्रेमचंद सामंत के मुंशी थे या नहीं, लेकिन यह निश्चित है कि धर्मवीर ब्राह्मणवाद के पक्के सामंत बन गए हैं. इसलिए धर्मवीर को ब्राह्मणवाद का सामंत कहना ज्यादा ठीक लग रहा है.’ (पृ.196)&lt;br /&gt;उनकी दूसरी महत्वपूर्ण स्थापना, जिसे वे सन् 2004 से बार-बार विभिन्न मंचों पर दोहरा रहे हैं, कि हमें इस साहित्य को ‘दलित साहित्य’ के स्थान पर ‘अंबेडकरवादी साहित्य’ कहना चाहिए. &lt;br /&gt;इस किताब के अंतिम लेख ‘लोकतंत्र और दलित उत्पीड़न की संस्कृति’ में डॉ. तेज सिंह कहते हैं—‘भारत का इतिहास ब्राह्मणवाद और बौद्ध-धम्म के अनुयायियों के बीच परस्पर संघर्ष का इतिहास रहा है.’ इसी तरह यह किताब भी अंबेडकरवादी-लोकवादी शक्तियों और ब्राह्मणवादी-पूँजीवादी शक्तियों के बीच संघर्ष का दस्तावेज है. &lt;br /&gt;कितना सटीक है इस पुस्तक का अंतिम वाक्य—‘सामाजिक लोकतंत्र के रास्ते ही हम समाजवाद के संकल्प को पूरा कर सकते हैं जिसमें दलित-पिछड़े वर्ग को हिंदुत्व की अपसंस्कृति से पूरी तरह मुक्ति मिल सकेगी.’ (पृष्ठ 216)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुस्तक का नाम : दलित समाज और संस्कृति&lt;br /&gt;लेखक  : तेज सिंह&lt;br /&gt;प्रकाशक : आधार प्रकाशन प्रा. लि., पंचकूला, हरियाणा&lt;br /&gt;प्रथम संस्करण  : 2007&lt;br /&gt;मूल्य  :  250/-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://blogvani.com/logo.aspx"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Blogvani Link --&gt;&lt;a href='http://www.blogvani.com/trans/eng/?url=http://lokmitr.blogspot.com/'&gt;&lt;img src='http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg' alt='www.blogvani.com' style='border:0'/&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-- Blogvani Link Ends --&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1713771972607997617-1453565637027536469?l=lokmitr.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lokmitr.blogspot.com/feeds/1453565637027536469/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1713771972607997617&amp;postID=1453565637027536469&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1713771972607997617/posts/default/1453565637027536469'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1713771972607997617/posts/default/1453565637027536469'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lokmitr.blogspot.com/2008/01/blog-post.html' title='दलित पुनर्जागरण के सवाल'/><author><name>वेद प्रकाश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13067846901937499742</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCSwp1kYnLQ/R7pXzEJLAEI/AAAAAAAAAAY/JZYuaNR5tzE/S220/DSC00584.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1713771972607997617.post-6106310868704224652</id><published>2007-12-17T13:13:00.000+05:30</published><updated>2007-12-17T13:20:25.925+05:30</updated><title type='text'>सूचना प्रौद्योगिकी और हिंदी समाज</title><content type='html'>हमारी सदी सूचना क्रांति की सदी है. आज पूरी दुनिया में सूचना प्रौद्योगिकी का डंका बज रहा है. ‘वसुधैव कुटुम्बकं’ का आदर्श और कहीं चरितार्थ होता हो या नहीं, कम से कम सूचना प्रौद्योगिकी की दुनिया में तो चरितार्थ होता ही है. मोबाइल फोन, कंप्यूटर और इंटरनेट इस क्रांति के वाहक हैं. हालाँकि हमारे देश में सामान्यतः सूचना प्रौद्योगिकी का मतलब कंप्यूटर समझा जाता है. यह कुछ ग़लत भी नहीं है. क्योंकि कंप्यूटर चिप ही सूचना क्रांति का आधार है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूचना प्रौद्योगिकी के कारोबार का माध्यम बनने ने अनंत संभावनाओं के द्वार पहले ही खोल दिए थे,  रही-सही कसर इसके मनोरंजन का साधन बनने ने पूरी की, जिसने छोटे-छोटे बच्चों से लेकर प्रौढ़ों तक को अपने सम्मोहन में जकड़ लिया. इंटरनेट ने तो गृहणियों और बुज़ुर्गों तक पर अपना रंग चढ़ा दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय अभिजात्य वर्ग के जातिगत अभिमान और उनकी शारीरिक श्रम के प्रति चिरस्थायी घृणा का सूचना प्रौद्योगिकी के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. इसके चलते कंप्यूटर तंत्र के विकास में हार्डवेयर की घोर उपेक्षा हुई. नतीजतन हार्डवेयर का मूल्य अन्य देशों की अपेक्षा खासा ज्यादा रहा. जिससे मध्यमवर्ग के आदमी के लिए भी कंप्यूटर खरीदना एक विलासिता ही रहा. दूसरी तरफ, हमारे अभिजात वर्ग की जनभाषा से घृणा ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को कंप्यूटर से दूर रखा. कंप्यूटरी में हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के विषय में जो प्रयास किए भी गए, उनका भी इन्होंने प्रचार नहीं किया. और हिंदी कंप्यूटरी के संबंध में भ्रमजाल फैलाया. उक्त दोनों कारणों से कंप्यूटर संस्कृति की पैठ समाज में व्यापक और निम्न स्तरों तक नहीं हो पाई. फलस्वरूप इसने भारत में डिज़िटल विभाजन पैदा किया, जो लगातार बढ़ता ही जा रहा है. इसने एक ओर कुशल और महँगे श्रम का बढ़ता बाज़ार बनाया तो दूसरी ओर अकुशल रोज़गार का लगभग पूरी तरह खात्मा कर दिया. जिससे हमारे यहाँ पहले से ही मौजूद आर्थिक असमानता की खाई और भी तेज़ी से चौड़ी होती चली गई.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम हिंदी भाषी में जहाँ कंप्यूटर के प्रति आकर्षण है, वहीं अंग्रेज़ी के वर्चस्व के कारण असहायता भी दिखाई देती है. इस असहायता और हीन भावना को बढ़ाने में अंग्रेज़ी परस्त लोगों के फैलाए झूठों का भी योगदान है. जिनमें से सबसे ज़्यादा प्रचारित और प्रचलित झूठों में से कुछ इस प्रकार हैं—&lt;br /&gt;एक तरफ तो यह कि &lt;br /&gt;एक, हिंदी में कंप्यूटर पर काम करना संभव ही नहीं है. &lt;br /&gt;दो, यदि है भी तो केवल निचले स्तर का काम ही संभव है.  &lt;br /&gt;तीन, उच्च स्तर की सारी कंप्यूटरी केवल अंग्रेज़ी में होती है. &lt;br /&gt;चार, सारे मूल सॉफ्टवेयर अंग्रेज़ी में बनते हैं और प्रोग्रामिंग तो केवल अंग्रेज़ी में होती है. &lt;br /&gt;और यदि आप यह साबित कर दें कि यह संभव है तो दूसरी तरफ यह कि—&lt;br /&gt;हिंदी में काम करना बहुत मुश्किल है. क्योंकि पहले तो तुम्हें हिंदी टाइप करना नहीं आएगा. &lt;br /&gt;दूसरे, अगर आ भी गई तो हिंदी फोंट नहीं मिलेगा. &lt;br /&gt;तीसरे, यदि मिल भी गया तो तुम इंटरनेट ब्राउज़ नहीं कर सकोगे, ई-मेल नहीं भेज सकोगे. &lt;br /&gt;चौथे, ऑपरेटिंग सिस्टम तो केवल अंग्रेज़ी में चलता है. यदि तुमने हिंदी का ऑपरेटिंग सिस्टम जुगाड़ भी लिया तो दूसरे कंप्यूटरों से कनेक्ट कैसे करोगे क्योंकि वे तो अंग्रेज़ी के ऑपरेटिंग सिस्टम पर चल रहे हैं. &lt;br /&gt;यदि आप यह भी झेल लें तो उनका ब्रह्मास्त्र तैयार है कि तुम्हें कंप्यूटर की हिंदी ही समझ में नहीं आएगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह हौवा खड़ा कर अंग्रेज़ीदाँ लोग झूठ के इस पुलिंदें को कुछ यूँ प्रचारित करने में सफल रहे हैं कि यदि तुम हिंदी-हिंदी चिल्लाओगे तो देश तो पीछे रह ही जाएगा, तुम खुद भी मोटी तनख्वाहों और विदेशी दौरों से वंचित रह जाओगे. इसलिए बेहतर यही है कि तुम अंग्रेज़ी ही सीख लो और उसी में अपना काम करो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें से कुछ झूठ अपने निहित स्वार्थों की रक्षा के लिए फैलाए गए तो कुछ अज्ञानतावश. ख़ैर, यह कौआरौर ज़्यादा समय तक समाज को नहीं बरगला सकती. खासकर इसलिए भी कि इसने सूचना क्रांति के प्रसार को बुरी तरह महानगरों तक सीमित कर दिया है. आज भारतीय कंपनियों से ज्यादा अमरीकी कंपनियों को हिंदी की चिंता सता रही है. क्योंकि वे जानती हैं कि हिंदी के ज़रिए पूरे दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप के बाज़ार के दरवाज़े और तेज़ी से खुलते हैं. कारोबार और मनोरंजन की दुनिया आम जनता की दुनिया है. यह केवल कुछ सरकारी नौकरशाहों और अभिजात्य लोगों की सनक पर टिकी नहीं रह सकती. यही कारण है कि आज लगभग हर अमरीकी और यूरोपीय कंपनी अपने उत्पादों में हिंदी समर्थन दे रही है. और उनके हिंदी संस्करण बाज़ार में उतार रही है. &lt;br /&gt;इस वास्तविकता के बारे में हमारा हिंदी समाज क्या सोचता है? तकनीक और विज्ञान विरोधी हिंदी समाज को ऐसा लगा—‘दीवान-ए-सराय 01 के संपादक के शब्दों में कहें तो’ – &lt;br /&gt;“जैसे कलिकाल आ धमका है. अपनी जानी-पहचानी दुनिया ध्वंस के कगार पर है, नैतिक वज्रपात हो रहे हैं, दैनंदिन ‘नंगई’ हो रही है, अपसंस्कृति फैल रही है और न जाने क्या-क्या. कुल मिलाकर लगता है कि ‘विश्वायन’ या वैश्वीकरण के रूप में सर्वथा शत्रु-जीवी हिंदी को एक नया शत्रु, सर्वशक्तिमान, सर्वोपस्थित खलनायक मिल गया है. इस विचार दृष्टि के प्रभुत्व का एक साफ़ घाटा यह हुआ है कि संचार के अभिनव रूप भी अविच्छिन्न तौर पर विश्वायन-जन्य दीगर हिंसाओं से जुड़कर एकमुश्त निंदा के शिकार हो गए हैं.”(1)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब हिंदी समाज को सूचना क्रांति में रोज़गार के अवसर, विदेशी दौरे और अनाप-शनाप पैसा दिखा तो फिर शुरू हुआ, किसी तरह इस भीड़ में ठस जाने का सिलसिला. यानी कैसे भी अपने बिचुवा को कोई कंप्यूटर कोर्स करा दो, फिर उसे कहीं फिट करा दो, बस हो गए वारे न्यारे. बदकिस्मती से कंप्यूटर की दुनिया में फिट करना उतना आसान नहीं है. यहाँ आपकी काबलियत और मेहनत ही आपको टिका के रख सकती है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Blogvani Link --&gt;&lt;a href='http://www.blogvani.com/trans/eng/?url=http://lokmitr.blogspot.com/'&gt;&lt;img src='http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg' alt='www.blogvani.com' style='border:0'/&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-- Blogvani Link Ends --&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1713771972607997617-6106310868704224652?l=lokmitr.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lokmitr.blogspot.com/feeds/6106310868704224652/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1713771972607997617&amp;postID=6106310868704224652&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1713771972607997617/posts/default/6106310868704224652'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1713771972607997617/posts/default/6106310868704224652'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lokmitr.blogspot.com/2007/12/blog-post_7997.html' title='सूचना प्रौद्योगिकी और हिंदी समाज'/><author><name>वेद प्रकाश</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13067846901937499742</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_qCSwp1kYnLQ/R7pXzEJLAEI/AAAAAAAAAAY/JZYuaNR5tzE/S220/DSC00584.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1713771972607997617.post-2452717849870736776</id><published>2007-12-11T15:26:00.000+05:30</published><updated>2007-12-11T15:38:11.278+05:30</updated><title type='text'>ठेठ हिंदी का ठाठ</title><content type='html'>आज एक नकली हिंदी सब तरफ छायी हुई है. कारण कि जिसे देखो वह अंग्रेजी की बैसाखी के बिना सोचना ही नहीं चाहता. नतीजा यह कि वाक्य विन्यास हो या कहने का सलीका, सब पर अंग्रेज़ी की छाया है.  जिससे हिंदी की पठनीयता बुरी तरह प्रभावित होती है. &lt;a href="http://masijeevi.blogspot.com"&gt;मसिजीवी&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Blogvani Link --&gt;&lt;a href='http://www.blogvani.com/trans/eng/?url=http://lokmitr.blogspot.com/'&gt;&lt;img src='http://blogvani.com/images/blogvanilink.jpg' alt='www.blogvani.com' style='border:0'/&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-- Blogvani Link Ends --&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1713771972607997617-2452717849870736776?l=lokmitr.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lokmitr.blogspot.com/feeds/2452717849870736776/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1713771972607997617&amp;postID=2452717849870736776&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1713771972607997617/posts/default/2452717849870736776'/><link 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